अगर आप चार बरस के बच्चे से कुत्ते की तस्वीर बनाने को कहेंगे, तो जाहिर है उससे परफेक्ट तस्वीर नहीं बनेगी। लेकिन, वो बच्चा भी किसी कुत्ते के चार पैर, दो कान और एक नाक को सही-सही बनाएगा। बच्चों के मुकाबले अक्लमंद मशीनों की बात करें तो वो बिल्कुल असली दिखने वाले कुत्तों की तस्वीरें तो बना लेंगी। लेकिन, कभी आंख में हेर-फेर होगी, तो कभी नाक या जीभ में। फर को बनाने की उस्ताद मशीनें तो सारा ध्यान कुत्तों के फर बनाने में ही लगा देती हैं। इंसानों की तस्वीरें बनाने में तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस वाली मशीनों को और भी दिक्कत होती है। वो ऊपरी तौर पर तो सही तस्वीरें बना देते हैं मगर चेहरे इतने बिगड़े हुए होते हैं कि पहचानना मुश्किल हो जाता है। कई बार तो वो इंसानों की बहुत भयानक तस्वीरें बना देते हैं। एंड्रू ब्रॉक के साथ काम करने वाले जेफ डोना ह्यू और कैरेन सिमोन्यान कहते हैं कि इसकी बड़ी वजह व्यक्ति-व्यक्ति में फर्क होना है। इसीलिए अक्सर अक्लमंद मशीनें कंफ्यूज हो जाती हैं कि वो इंसानों को कैसे गढ़ें। उन्हें इंसानों की सही फोटो बनाने के लिए और डेटा की जरूरत है।