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इस दिवाली जलाएं ग्रीन पटाखे, जानिए क्या हैं, कहां और कब मिलेंगे

Wed, 24 Oct 2018 06:28 PM IST
बीबीसी हिन्दी
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green crackers - फोटो : @tonysarkaar
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को देशभर में पटाखों की बिक्री पर पाबंदी लगाने से इनकार करते हुए कुछ शर्तों के साथ दिवाली पर आतिशबाजी की छूट दी है। दिवाली पर सिर्फ दो घंटे के लिए रात 8 से 10 बजे तक पटाखे जलाए जा सकेंगे। इसके साथ कोर्ट ने यह भी आदेश दिया है कि त्योहारों में कम प्रदूषण वाले 'ग्रीन पटाखे' ही जलाए और बेचे जाने चाहिए।

जस्टिस एके सीकरी और जस्टिस अशोक भूषण की पीठ ने कहा कि प्रतिबंधित पटाखे बेचे जाते हैं तो संबंधित इलाके के थाना प्रभारियों को जिम्मेदार ठहराया जाएगा और उन पर अवमानना का मामला चलेगा। सुप्रीम कोर्ट ने जिस 'ग्रीन पटाखों' की बात की है वो आखिर होते क्या है और पारंपरिक पटाखों से वे अलग कैसे होते हैं?

दरअसल 'ग्रीन पटाखे' राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नीरी) की खोज हैं जो पारंपरिक पटाखों जैसे ही होते हैं पर इनके जलने से कम प्रदूषण होता है। नीरी एक सरकारी संस्थान है जो वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंघान परिषद (सीएसआईआर) के अंदर आता है। नीरी ने ग्रीन पटाखों पर जनवरी में केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन के उस बयान के बाद शोध शुरू किया था जिसमें उन्होंने इसकी जरूरत की बात कही थी।
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ग्रीन पटाखे होते क्या हैं?

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- फोटो : @sunoneta
ग्रीन पटाखे दिखने, जलाने और आवाज में सामान्य पटाखों की तरह ही होते हैं, लेकिन इनसे प्रदूषण कम होता है। सामान्य पटाखों की तुलना में इन्हें जलाने पर 40 से 50 फीसदी तक कम हानिकारक गैस पैदा होती है। नीरी के चीफ साइंटिस्ट डॉक्टर साधना रायलू कहती हैं कि इनसे जो हानिकारक गैसें निकलेंगी, वो 40 से 50 फीसदी तक कम निकलेंगी। ऐसा भी नहीं है कि इससे प्रदूषण बिल्कुल भी नहीं होगा। पर हां, ये कम हानिकारक पटाखे होंगे।

डॉक्टर साधना बताती हैं कि सामान्य पटाखों के जलाने से भारी मात्रा में नाइट्रोजन और सल्फर गैस निकलती है, लेकिन उनके शोध का लक्ष्य इनकी मात्रा को कम करना था। ग्रीन पटाखों में इस्तेमाल होने वाले मसाले बहुत हद तक सामान्य पटाखों से अलग होते हैं। नीरी ने कुछ ऐसे फॉर्मूले बनाए हैं जो हानिकारक गैस कम पैदा करेंगे।
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कैसे-कैसे ग्रीन पटाखे

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- फोटो : PTI
डॉक्टर साधना बताती हैं कि उनके संस्थान ने ऐसे फॉर्मूले तैयार किए हैं जिसके जलने के बाद पानी बनेगा और हानिकारक गैस उसमें घुल जाएगी। इन ग्रीन पटाखों की बेहद खास बात है जो सामान्य पटाखों से उन्हें अलग करती है। नीरी ने चार तरह के ग्रीन पटाखे बनाए हैं। 

पानी पैदा करने वाले पटाखेः ये पटाखे जलने के बाद पानी के कण पैदा करेंगे, जिसमें सल्फर और नाइट्रोजन के कण घुल जाएंगे। नीरी ने इन्हें सेफ वाटर रिलीजर का नाम दिया है। पानी प्रदूषण को कम करने का बेहतर तरीका माना जाता है। पिछले साल दिल्ली के कई इलाकों में प्रदूषण का स्तर बढ़ने पर पानी के छिड़काव की बात कही जा रही थी।

सल्फर और नाइट्रोजन कम पैदा करने वाले पटाखेः नीरी ने इन पटाखों को STAR क्रैकर का नाम दिया है, यानी सेफ थर्माइट क्रैकर। इनमें ऑक्सीडाइजिंग एजेंट का उपयोग होता है जिससे जलने के बाद सल्फर और नाइट्रोजन कम मात्रा में पैदा होते हैं। इसके लिए खास तरह के केमिकल का इस्तेमाल होता है।

कम एल्यूमीनियम का इस्तेमालः इस पटाखे में सामान्य पटाखों की तुलना में 50 से 60 फीसदी तक कम एल्यूमीनियम का इस्तेमाल होता है। इसे संस्थान ने सेफ मिनिमल एल्यूमीनियम यानी SAFAL का नाम दिया है।

अरोमा क्रैकर्सः इन पटाखों को जलाने से न सिर्फ हानिकारण गैस कम पैदा होगी बल्कि ये बेहतर खुशबू भी बिखेरेंगे।

कहां मिलेंगे ग्रीन पटाखे

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- फोटो : file photo
ग्रीन पटाखे फिलहाल भारत के बाजारों में उपलब्ध नहीं हैं। यह नीरी की खोज है और इसे बाजार में आने में काफी वक्त लग सकता है। इसे बाजार में उतारने से पहले सरकार के सामने इसके गुण और दोष का प्रदर्शन करना होगा जिसके बाद इसे बाजार में उतारने की अनुमति मिलेगी। फिलहाल भारत के बाजारों में पारंपरिक तरीके से पटाखों का निर्माण हो रहा है। हालांकि कुछ केमिकल पर प्रतिबंध लगने के बाद कई तरह के पटाखों का निर्माण बंद हो चुका है। नीरी ने भले ही ग्रीन पटाखे बनाए हों, लेकिन इसके निर्माण की जिम्मेदारी भारतीय बाजारों पर ही होगी। ऐसे में बिना बेहतर प्रशिक्षण के इसे बनाना चुनौती होगी।
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दुनिया में कहां-कहां ग्रीन क्रैकर्स जलाए जाते हैं

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supreme court - फोटो : PTI
सुप्रीम कोर्ट ने जिस ग्रीन पटाखों के बारे में बात की है उसका इस्तेमाल दुनिया के किसी देश में नहीं होता है। डॉक्टर साधना कहती हैं कि ग्रीन पटाखे का आइडिया भारत का है और अगर इसे बाजारों में उतारा जाता है तो हम दुनिया को एक नई दिशा दे सकते हैं। वो बताती हैं कि इस दिशा में संस्थान का शोध पूरा हो चुका है और अब मामला सरकारी एजेंसियो के पास है। डॉक्टर साधना कहती हैं कि हमलोगों ने अप्रूवल के लिए पेट्रोलियम तथा विस्फोटक सुरक्षा संगठन (PESO) को लिखा है। उसकी अनुमति मिलने के बाद इसे बाजार में उतारा जा सकेगा।
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