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अजब गजब: धोखाधड़ी करने वाले लोगों को क्यों कहा जाता है 420? जानिए इसके पीछे की रोचक वजह

Wed, 16 Mar 2022 12:59 PM IST
ज्योति मेहरा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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छल, ठगी या धोखाधड़ी करने वाले को क्यों कहा जाता है 420? - फोटो : istock
आम बोल चाल में आपने कई बार 420 संख्या जरूर सुनी होगी। जब भी कोई बेईमानी, ठगी या छल करता है, तो लोग उसे 420 कहते हैं। आपने कई बार इस तरह की बातें सुनी होंगी, जैसे- 'तुम तो बड़े 420 हो यार', 'वो तो 420 निकला'। लेकिन बहुत कम लोग ही इसके पीछे की वजह जानते हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि हम धोखाधड़ी या छल करने वाले के लिए 420 संख्या का ही इस्तेमाल क्यों करते हैं? इसकी जगह हम 421 या 520 क्यों नहीं बोलते? अगर आपको भी इसके बारे में जानकारी नहीं हैं, तो ये खबर आपके बड़े काम की है। आज हम 420 संख्या के पीछे का मतलब बताने जा रहे हैं।

दरअसल, भारतीय दंड संहिता की धारा 420 के कारण ठगी, बेईमानी करने वाले लोगों को 420 कहा जाता है। जब भी कोई व्यक्ती ठगी, बेईमानी, धोखाधड़ी जैसे काम करता है, तो उस पर पुलिस के द्वारा धारा 420 लगाई जाती है। यही वजह है कि आम बोलचाल में लोग इस नंबर का ही इस्तेमाल करते हैं।
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छल, ठगी या धोखाधड़ी करने वाले को क्यों कहा जाता है 420? - फोटो : istock
क्या है धारा 420
कानूनी तौर पर जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के साथ धोखा करता है, छल करता है या बेईमानी से किसी दूसरे व्यक्ति की बहुमूल्य वस्तु या संपत्ति के साथ हेर फेर करता है या उसे नष्ट करता है, तो उसके खिलाफ धारा 420 लगाई जा सकती है। इतना ही नहीं अगर वो इस काम में किसी की मदद भी करता है, तो वह अपराधी माना जाता है।
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छल, ठगी या धोखाधड़ी करने वाले को क्यों कहा जाता है 420? - फोटो : istock
इसके अलावा जब कोई व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए दूसरे के साथ जालसाजी करता है, उसके नकली हस्ताक्षर करके, आर्थिक और मानसिक दबाव बनाकर उसकी संपत्ति को अपने नाम करता है तो उसके खिलाफ भी धारा 420 लगाई जा सकती है।

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छल, ठगी या धोखाधड़ी करने वाले को क्यों कहा जाता है 420? - फोटो : istock
वहीं इन मामलों की सुनवाई प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट की अदालत में होती है। अपराधी को इसमें अधिकतम सात साल की सजा हो सकती है। साथ ही जुर्माना भी लगाया जा सकता है।
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छल, ठगी या धोखाधड़ी करने वाले को क्यों कहा जाता है 420? - फोटो : istock
ये अपराध गैर-जमानती और संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है। इसका मतलब ये है कि इन मामलों में थाने से बेल नहीं मिलती। ऐसे मामलों में खुद जज अदालत में फैसला करते हैं।
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