ओसामा बिन लादेन
- फोटो : Social media
1994 में अफगानिस्तान के भीतर तालिबान एक शक्तिशाली आंदोलन बन गया था। इस दौरान पाकिस्तान ने तालिबान से जुड़े लोगों को भारी मात्रा में आर्थिक सहायता, सैन्य सहायता और हथियार मुहैया कराया, ताकि तालिबान के जरिए सेंट्रल एशिया से पाकिस्तान का व्यापार मार्ग खुलवाया जा सके। पाकिस्तान की इस सहायता के चलते तालिबान काफी मजबूत हो गया और देखते ही देखते उसने 1996 में राजधानी काबुल को अपने कब्जे में ले लिया। धीरे-धीरे उसने बाकी हिस्सों को भी अपने गिरफ्त में लेने की शुरुआत की। इस बीच अफगानिस्तान की सरकार और तालिबान के बीच कई सारे युद्ध हुए। इस दौरान पाकिस्तान ने तालिबान के साथ विभिन्न स्तरों पर अपने रिश्ते मजबूत कर लिए थे। उसने कई तालिबानी नेताओं को अपने यहां पर ट्रेनिंग दी। इसी बीच 1996 के आसपास ओसामा बिन लादेन दोबारा अफगानिस्तान में आता है, जहां उसका तालिबान के नेताओं ने पुरजोर ढंग से स्वागत किया। ओसामा बिन लादेन के मंसूबे कुछ और थे, जिसे पूरा करने के लिए उसने तालिबान के भीतर आतंकवादियों को भर्ती करने की शुरुआत की। इसे देखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ ने ओसामा बिन लादेन को पकड़ने के लिए प्रस्ताव पारित किया, जिसका कोई ठोस निष्कर्ष नहीं निकला।