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Fore Tribe: अपने मां-बाप के शव को भी खाती जाती थी ये जनजाति, जानिए आखिर कैसी थी परंपरा

Tue, 09 Jul 2024 01:32 PM IST
धर्मेंद्र सिंह फीचर डेस्क, अमर उजाला
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अपने मां-बाप के शव को भी खाती जाती थी ये जनजाति - फोटो : Istock
Fore Tribe: दुनियाभर में कई रहस्यमयी जनजातियां पाई जाती हैं। इन जनजातियों को उनकी परंपराओं, रहन-सहन और खान-पान के लिए जाना जाता है। यह आदिवासी जनजातियां अभी भी हजारों साल पुरानी परंपराओं का पालन करती हैं। यह जनजातियां जिस स्थान पर रहती हैं, वहां पर उनका पूरा अधिकारा होता है। इन प्रजातियों के अधिकारों में सरकारें भी दखल नहीं देती हैं।

दुनिया में रहने वाली इन जनजातियों में कुछ बेहद खतरनाक होती हैं। पापुआ न्यू गिनी (Papua New Guinea) में पाई जानी वाली एक जनजाति बेहद खतरनाक मानी जाती है। यह जनजाति अपने अजीबोगरीब रिवाज के लिए पूरी दुनिया में जानी जाती है। इनकी परंपरा के बारे में जानकर आप हैरान हो जाएंगे। इस जनजाति में किसी भी शख्स के अंतिम संस्कार के दौरान इंसान के दिमाग को खाने की परंपरा थी। आज हम आपको पापुआ न्यू गिनी में मिलने वाली फोर जनजाति के बारे में कुछ रोचक बातें बतातें हैं। 

 
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अपने मां-बाप के शव को भी खाती जाती थी ये जनजाति - फोटो : Istock
ब्रिटेन और पापुआ न्यू गिनी में फोर जनजाति (Fore Tribe) मिलती है। वैज्ञानिकों ने इन जनजाति के लोगों पर शोध किया है, जिसमें हैरान करने वाला खुलासा हुआ है। इस जनजाति के खाने में मृत रिश्तेदारों का दिमाग भी शामिल था। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, 1960 के दशक तक इस जनजाति के कबीले में परंपरा थी कि वह लोग परिजनों की मौत के बाद उन्हें जलाने या दफनाने की जगह खा जाते थे। 
 
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अपने मां-बाप के शव को भी खाती जाती थी ये जनजाति - फोटो : Istock
फोर जनजाति में किसी शख्स का अंतिम संस्कार होता था, तो वहां दावत का आयोजन किया जाता था। इन आयोजनों में लोग अपने मरने वाले रिश्तेदारों का मांस खाते थे, तो वहीं महिलाएं उनका दिमाग खाती थीं। जनजाति के लोग अपने प्रिय लोगों के सम्मान के तौर पर इस प्रथा का पालन करते थे। यह जनजाति मानती थी कि अगर शरीर को दफनाया जाता है या कहीं पर रखने से कीड़े खाते हैं। इससे अच्छा है कि मृतक से प्यार करने वाले लोग शरीर को खा जाएं। 

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अपने मां-बाप के शव को भी खाती जाती थी ये जनजाति - फोटो : Istock
महिलाएं मृत व्यक्ति के शरीर से दिमाग को निकालती थीं और बांस में भरकर पकाती थीं। पित्ताशय को छोड़कर शरीर के सभी मांस को भूनकर खा जाते थे। हालांकि, महिलाओं की मौत सिर्फ महिलाएं उन्हें खाती थीं। इन जनजाति के लोग यह नहीं जानते थे कि मानव मस्तिष्क में एक घातक अणु (molecule) पाया जाता है जिसके खाने पर मौत हो सकती है। इस बीमारी के कारण जनजाति के करीब दो प्रतिशत लोगों की मौत हो जाती थी। एक शोध से पता चला कि प्रायन्स' नामक प्रोटीन के कारण होने वाली बीमारियों में कुरू भी शामिल है। इसमें रीप्रोड्यूस करने और संक्रामक बनने की क्षमता होती है। 

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अपने मां-बाप के शव को भी खाती जाती थी ये जनजाति - फोटो : Istock
मानव विज्ञानी शर्ले लिंडेनबॉम ने साल 1950 के दौरान खोज की कि जनजाति के लोगों में यह परंपरा एक मानसिक बीमारी है। इस बीमारी को कुरु कहा जाता है। उन्होंने एक मीडियो को बताया कि जब उनसे सवाल किया गया कि आप लोग शरीर के साथ ऐसा क्यों करते हैं? उनका कहना था कि हमने उन्हें खा लिया। कुरु एक लाइलाज न्यूरोलॉजिकल कंडीशन है, जिससे नर्वस सिस्टम लगभग बंद हो जाता है। माना जाता है कि यह किसी इंफेक्शन के शिकार व्यक्ति के मस्तिष्क को खाने के कारण आई होगी और दूसरों में भी फैलती गई और परंपरा बन गई। 
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