कुंडली में ग्रहण योग
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ग्रहण योग
कुंडली में कहीं भी सूर्य अथवा चन्द्रमा की युति राहु या केतु से हो जाती है तो इस दोष का निर्माण होता है। यदि यह योग चन्द्रमा के साथ बना तो जातक हमेशा डर व घबराहट महसूस करता है और चिड़चिड़ापन उसके स्वभाव का हिस्सा बन जाता है।
साथ ही मां के सुख में कमी, किसी भी कार्य को शुरू करने के बाद उसे अधूरा छोड़ देना व नए काम के बारे में सोचना इस योग के लक्षण हैं। किसी भी प्रकार के फोबिया अथवा किसी भी मानसिक बीमारी जैसे डिप्रेशन, सिज्रेफेनिया आदि इसी योग के कारण माने गये हैं। यदि चन्द्रमा अधिक दूषित हो जाता है तो मिर्गी, चक्कर व मानसिक संतुलन खोने का डर भी होता है।
वहीं सूर्य द्वारा बनने वाला ग्रहण योग पिता के सुख में कमी करता है। जातक का शारीरिक ढांचा कमजोर हो जाता है। आंखों व हृदय संबंधी रोगों का कारक बनता है। सरकारी नौकरी या तो मिलती नहीं या उसमें निर्वाह मुश्किल से होता है। डिपार्टमैंटल इंक्वाइरी, सजा, तरक्की में रूकावट आदि सब इसी योग का परिणाम हैं।