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गिरकर उठना जानती हैं साइना नेहवाल

Mon, 03 Feb 2014 10:53 AM IST
सत्येन्द्र पाल सिंह
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शिखर पर पहुंचने के बाद उससे खिसकना बहुत सालता है। इसकी टीस देश की धुरंधर बैडमिंटन खिलाड़ी साइना नेहवाल से बेहतर और कौन बयां कर सकता है।
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साइना दुनिया की उन गिनी-चुनी खिलाड़ियों में से एक हैं, जिन्होंने ′चीन की अभेद्य दीवार′ में सेंध लगाने का दम दिखाया। इसी के बूते वह विश्व बैडमिंटन रैंकिंग में दूसरे पायदान तक पहुंचीं।

साइना ने 2009 से 2012 के दौरान 11 वर्ल्ड सुपर सीरीज खिताब जीते। उन्होंने 2012 में लंदन ओलंपिक में महिला सिंगल्स में कांस्य जीत यह गौरव पाने वाली भारत की पहली खिलाड़ी बनकर इतिहास ही रच दिया।
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उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों में 2006 में कांस्य और 2010 में दिल्ली में स्वर्ण जीता था। यह सब साइना के लिए एक स्वप्निल दौर सा रहा। इस दौरान साइना ने एक भूल कर दी। अपनी रैंकिंग लगातार बेहतर करने के लिए उन्होंने अधिक से अधिक टूर्नामेंट में भाग लेने की रणनीति अपनाई।

नए साल में बदली किस्मत

रैंकिंग तो बेहतर नहीं हुई, उल्टे वह चोट खा बैठीं। खराब फिटनेस से जूझतीं साइना विश्‍व रैंकिंग में नौंवे स्‍थान पर जा खिसकीं। ज्यादातर टूर्नामेंट में क्वॉर्टर फाइनल और कुछ के सेमीफाइनल में पहुंचने के बाद उनकी चुनौती टूटती रही। पर गिरकर उठना ही असली चैंपियन की पहचान है।

साइना नेहवाल की किस्मत ने आखिर करवट ली। उन्होंने डेढ़ बरस के लंबे अंतराल के बाद आखिरकार साल के शुरू में ही अपना पहला खिताब जीत लिया। साइना का सैयद मोदी इंटरनेशनल इंडिया ग्रां प्री गोल्ड बैडमिंटन में महिला एकल खिताब जीतना बड़ी कामयाबी है। उन्होंने इससे पहले 2012 में डेनमार्क ओपन सुपर सीरीज के रूप में अपना आखिरी खिताब जीता था।

लखनऊ में मिली खिताबी जीत से पहले 2012 में फ्रेंच ओपन उनका आखिरी फाइनल था।

लौट आया खोया आत्मविश्‍वास

साइना का आत्मविश्वास साल के शुरू में मिली जीत से लौट आया है। वह इस बात को स्वीकार भी करती हैं।

साइना ने खिताब जीतने के बाद कहा, "लखनऊ मेरे लिए फिर लकी रहा। मुझे यकीन नहीं हो पा रहा है कि मैंने यह खिताब जीत लिया है। मेरे लिए वापसी आसान नहीं थी। मैंने इसके लिए गोपी सर के साथ बहुत पसीना बहाया। मैं अपनी इस जीत का श्रेय गोपी सर को देना चाहूँगी। मैं यह बयां नहीं कर सकती कि 15 महीने के बाद खिताब जीतने का अहसास कितना सुखद है। यह भी सच है कि सिंधू बहुत बढ़िया खेलीं।"

उधर, सिंधू ने भी माना कि साइना उनसे बेहतर खिलाड़ी हैं। सिंधू ने कहा कि साइना सीनियर होने के नाते उनके खेल को बखूबी जानती हैं। साइना के खिलाफ जीतने के लिए मानसिक रूप से और मजबूत बनना होगा।
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अगला लक्ष्य ′सोने′ का सपना

साइना को लखनऊ में मिली जीत उनके शानदार बैडमिंटन करिअर की दूसरी बड़ी और कामयाब पारी हो सकती है। साइना अर्जुन अवॉर्ड (2009), राजीव गांधी खेल रत्न (2009-10) और 2010 में पद्मश्री से नवाजी जा चुकी हैं।

रियो में 2016 में होने वाले ओलंपिक खेलों में कांस्य से आगे सोना जीतने की ललक उनकी प्रेरणा बन सकती है। उस मुकाम तक पहुंचने में साइना के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी फिटनेस को बरकरार रखना होगा। यदि वह खुद को फिट रख पाती हैं तो कामयाबी की ऐसी दास्तान लिख सकती हैं, जो आने वाले खिलाड़ियों के लिए एक नजीर बन जाये।

भारतीय बैडमिंटन को आगे ले जाने में साइना और सिंधू का रोल खासा अहम हो सकता है। एक बात तो जरूर है कि साइना ने देश की बैडमिंटन खिलाडि़यों में दुनिया की सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों के साथ कदमताल करने का विश्वास भरा है। इसके लिए उनके जज्बे को सलाम।
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