तीन दिन पहले दिल्ली में एक युवती के साथ एक नामी कैब कंपनी की टैक्सी में हुई दुष्कर्म की घटना बताती है कि दो वर्ष पूर्व राजधानी में ही चलती बस में एक पैरा मेडिकल छात्रा के साथ हुई बलात्कार की बर्बर घटना के बाद बने कड़े कानून के बावजूद कुछ भी नहीं बदला है।
इस शर्मनाक घटना के बाद बेशक पुलिस ने 48 घंटे के भीतर ही आरोपी को पकड़ लिया है। मगर असली मुद्दा तो महिलाओं की सुरक्षा का है, जिसे लेकर पुलिस नाकारा ही साबित हुई है। इस ताजा घटना के बाद कुछ अहम पहलू एक बार फिर से उजागर हुए हैं, जिस पर विचार करने की जरूरत है। पहला यह कि तमाम दिशा-निर्देशों के बावजूद ऑटो और टैक्सियों में जीपीएस सिस्टम लागू क्यों नहीं हो सका है?
हैरानी की बात है कि कई देशों में अपनी सेवाएं देनी वाली उबर कंपनी की जिस टैक्सी में उस युवती के साथ बर्बरता की गई, उसमें जीपीएस सिस्टम तो छोड़ें, उसके पास दिल्ली में टैक्सी चलाने का परमिट तक नहीं था! इस युवती के साथ कथित तौर पर दुष्कर्म करने वाला शिव कुमार यादव इससे पहले भी अपनी टैक्सी में दुष्कर्म के मामले में जेल जा चुका है, इसके बावजूद कैसे इस नामी कंपनी ने उसे अपनी सेवा में रख लिया था? क्या पुलिस को इसकी सूचना दी गई थी? बेशक, ट्रांसपोर्ट विभाग ने उबर की टैक्सियों पर दिल्ली में अब रोक लगा दी है, लेकिन हैरानी की बात है कि वह अब तक नेशनल परमिट के नाम से कारोबार करती रही है।
2006 में रेडियो टैक्सी सेवा यह सोचकर शुरू की गई थी कि जिससे लोगों को आसानी से टैक्सी मिल सके, ताकि वे सुरक्षित तरीके से अपने गंतव्य तक पहुंच सकें। सवाल किसी एक टैक्सी सेवा पर उंगली उठाने का नहीं है। पिछले एक दशक में राजधानी दिल्ली में चलते वाहन में दुष्कर्म की कई घटनाएं हो चुकी हैं, जिनमें 2010 का चर्चित धौलाकुआं कांड भी है, जिसमें इसी वर्ष अक्तूबर में पांच लोगों को सजा सुनाई गई है।
इस घटना का दूसरा अहम पहलू यह है कि दुष्कर्म के मामले में मृत्यदंड के प्रावधान वाला कानून भी महिलाओं के लिए सुरक्षा कवच नहीं बन सका है। यह घटना आगे के लिए सबक होनी चाहिए, क्योंकि सिर्फ राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि तमाम महानगरों में महिलाओं और लड़कियों को शिक्षा और नौकरी के सिलसिले में रातों में भी अकेले सफर करना पड़ता है।