दीमापुर में केंद्रीय कारागार से कथित बलात्कार के एक आरोपी को बाहर निकालने, फिर उसकी हत्या कर देने की खबर ही इतनी स्तब्ध कर देने वाली थी कि हजारों किलोमीटर दूर उसकी गूंज अब भी सुनी जा रही है। पर अगर सिर्फ बांग्लादेशी होने के शक में भीड़ ने इस बर्बरता को अंजाम दिया, तब तो यह और भी चौंकाने वाली घटना है। जिस तरह जेल से सिर्फ उसी व्यक्ति को निकाला गया, और दूसरे किसी कैदी को खरोंच तक नहीं लगी, उससे लगता है कि घटना में जेल अधिकारियों की मिलीभगत रही होगी।
लिहाजा जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई तो ठीक है, पर हैरत की बात यह है कि जो शख्स असम से आकर लंबे समय से दीमापुर में रह रहा था, जिसके परिवार के लोग सेना में हैं, और खुद जिसने एक नगा लड़की से शादी की थी, उसकी वास्तविक पहचान करने में स्थानीय लोगों से लेकर जेल प्रशासन तक गच्चा खा गया। जाहिर है, यह कोई मामूली चूक नहीं है। हत्यारों ने कानून-व्यवस्था का तो मजाक बनाया ही, जिसकी सख्त सजा उन्हें मिलनी चाहिए, उन्होंने नगालैंड को अस्थिरता की उस आग में भी झोंक दिया, जिसका खामियाजा पूर्वोत्तर के राज्य जब-तब भुगतते हैं।
बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ गुस्से का सुबूत हम पूर्वोत्तर में अनेक बार देख चुके हैं; इस संदर्भ में असम के नेली हत्याकांड की स्मृति आज भी डरा देती है, जहां 2,000 बांग्लादेशियों की हत्या स्थानीय लोगों ने कर दी थी। दीमापुर में हुई इस बर्बरता के विरोध में न सिर्फ असम के ट्रक नगालैंड नहीं आ रहे, जिससे लोगों की मुश्किलें बढ़ने लगी हैं, बल्कि सवाल असम में नगाओं की सुरक्षा का भी है।
हालांकि असम और नगालैंड की सरकारों ने शांति स्थापित करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। पर यह आग बुझने के बाद घुसपैठियों के मामले में भी ठोस कदम उठाने की जरूरत है। इसके ब्योरे हैं कि दीमापुर में घुसपैठियों के खिलाफ माहौल बन रहा था। पूर्वोत्तर में घुसपैठियों के खिलाफ गुस्सा इसलिए है कि वे रोजगार में हिस्सा लेने के साथ स्थानीय परंपराओं से भी छेड़छाड़ करते हैं। चुनावी लाभ के लिए पूर्वोत्तर की जनसांख्यिकी बदलने की इजाजत नहीं दी जा सकती। उतना ही जरूरी पूर्वोत्तर तक विकास का फायदा पहुंचाना भी है, ताकि उसका गुस्सा गलत आदमी पर न उतरे।