रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा ने दोनों देशों की दशकों पुरानी दोस्ती में एक नया अध्याय जोड़ा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके बीच यों तो यह पहली शिखर बैठक थी, लेकिन पिछले कुछ महीनों के दौरान दोनों नेताओं की अंतरराष्ट्रीय मंचों पर न केवल कई मुलाकातें हो चुकी थीं, बल्कि दोनों ने द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने का संकेत दिया था, जिसकी पुष्टि दोनों देशों के बीच हुए समझौतों से होती है।
उल्लेखनीय यह भी है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद से मोदी ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों को खासी तरजीह दी है और उनकी अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग, जापानी प्रधानमंत्री शिंजो अबे, ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री टोनी एबोट जैसे नेताओं के साथ द्विपक्षीय बात हो चुकी है। इसके बावजूद पुतिन के साथ उनकी वार्ता को दोनों देशों के ऐतिहासिक संबंधों के मद्देनजर देखना चाहिए।
दरअसल यह ऐसा समय है, जब क्रीमिया को लेकर यूक्रेन पर की गई कार्रवाई के लिए पश्चिमी देशों ने रूस को एक तरह से उपेक्षित कर रखा है। मगर भारत ने हमेशा रूस के साथ संबंधों को पश्चिमी देशों के इस रुख से निरपेक्ष ही रखा। अहम बात यह है कि रूस ने भी भारत की नई सरकार के साथ दोस्ती को लेकर गर्मजोशी दिखाई है, जिसका नतीजा है कि उसने भारत में बारह और परमाणु संयंत्र स्थापित करने पर सहमति जताई है। उल्लेखनीय है कि कुडनकुलम में रूस निर्मित 1,000 मेगावाट के एक परमाणु संयंत्र ने काम करना शुरू कर ही दिया है।
इसके साथ ही तेल और गैस क्षेत्र में हुए समझौते भारत की ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए अहम माने जा सकते हैं। बावजूद इसके कि हाल ही में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें गिरी हैं, रूस के साथ यह समझौता दूरगामी कारणों से महत्वपूर्ण है। खुद प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि दूसरे विकल्प मौजूद होने के बावजूद रूस भारत का सबसे महत्वपूर्ण रक्षा सहयोगी बना रहेगा।
वास्तव में मोदी की नजर भू-राजनीतिक परिस्थितियों पर है, उससे कहीं अधिक तेज आर्थिक विकास उनकी प्राथमिकता में है। पुतिन की यात्रा से दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार की संभावनाएं और मजबूत हुई हैं और दोनों पक्षों में मुक्त व्यापार समझौते पर भी बात हुई है। मगर इस पर भी गौर करने की जरूरत है कि फिलहाल द्विपक्षीय व्यापार सिर्फ दस अरब डॉलर का ही है।