लोकसभा चुनाव से ठीक पहले केंद्र सरकार ने जाट समुदाय को पिछड़ी जातियों की केंद्रीय सूची में शामिल करने का जो कदम उठाया, वह इस तरह की पहली कवायद नहीं है, और न ही आखिरी होने वाली है। आजादी के करीब साढ़े छह दशक बाद भी समाज का कोई हिस्सा अगर पिछड़ा हुआ है, तो यह हमारी विकास नीति पर बड़ा सवाल है। यह विद्रूप ही है कि समूचे समाज को समान रूप से विकसित करने के बजाय सरकारें बार-बार उसके एक या दूसरे हिस्सों के बीच आरक्षण की रेवड़ी बांटकर अपना राजनीतिक लाभ साधने की कोशिश करती है। जबकि यह तथ्य बार-बार सामने लाया जा चुका है कि आरक्षण किसी जाति या समुदाय को ऊपर उठाने का तात्कालिक उपाय भर है।
जाटों की बात करें, तो इनकी पहचान मेहनती, समृद्ध और प्रभावशाली समुदाय के रूप में ही ज्यादा है। इसके बावजूद कुछ क्षेत्रों में इनके पिछड़ेपन ने इन्हें पिछड़ी जातियों में शामिल कराने के लिए आंदोलित किया, तो यह उस सामाजिक बदलाव का ही सुबूत है, जिसमें जातियां अब खुद को अगड़ी के बजाय पिछड़ी बताना ज्यादा पसंद करती हैं। पर इस मामले में सरकार का रवैया राजनीतिक लाभ उठाने की मंशा से प्रेरित है। किसी भी समुदाय को पिछड़ा घोषित करने के लिए उसके पिछड़ेपन के पक्ष में आंकड़े पेश करने पड़ते हैं।
लेकिन पिछड़ा वर्ग आयोग का अब तक का रुख जाट समुदाय को आरक्षण का लाभ देने के पक्ष में नहीं था। आयोग का ताजा सर्वेक्षण अभी आया भी नहीं है, लेकिन सरकार ने अपने हित में जल्दबाजी भरा कदम उठा लिया। जाटों को पिछड़ों का लाभ देने की घोषणा से दूसरी पिछड़ी जातियों की नाराजगी बढ़ेगी, क्योंकि नौकरियों में उनका हिस्सा सिकुड़ेगा। सरकारी नौकरियों की जो स्थिति है, उसे देखते हुए लगता नहीं कि जाट समुदाय को इसका बड़ा लाभ मिलेगा। पर बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार का यह फैसला अदालत में टिकेगा।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले उसने मुस्लिम आरक्षण का दांव चला था, पर अल्पसंख्यकों को उसका लाभ मिलने के बजाय वह मामला सर्वोच्च न्यायालय के संविधान पीठ में लंबित है। लेकिन विडंबना यह है कि चुनावी लाभ के ऐसे मामलों में सरकारें कभी सबक सीखना भी नहीं चाहतीं।