लोकसभा चुनाव के दौरान सतर्कता बरतने की हिदायत के बावजूद असम के बोडोलैंड क्षेत्रीय स्वायत्तशासी जिलों (बीटीएडी) में हिंसा और हत्या को रोक नहीं पाना दुर्भाग्यपूर्ण है, तो इस त्रासदी के तत्काल बाद दो बड़ी पार्टियों का रवैया संवेदनहीनता की पराकाष्ठा।
यह हत्याकांड अपनी क्षेत्रीय स्वायत्तता और पहचान को बनाए रखने के लिए बाहरी लोगों को निशाना बनाने की उसी मानसिकता का उदाहरण है, जिसका हिंसक सुबूत असम में बोडो और दूसरी जनजातियां इससे पहले भी कई बार दे चुकी हैं।
दरअसल कोकराझार लोकसभा सीट जीतना, जो बीटीएडी का मुख्यालय भी है, बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के एजेंडे में सबसे ऊपर है; क्योंकि अस्तित्व में आने के बाद फ्रंट कभी वहां चुनाव नहीं हारा है और एक बार हार जाने पर बोडोलैंड में गैर-बोडो समुदायों का हौसला बढ़ेगा। उसकी चिंता की एक बड़ी वजह यह भी है कि अगले साल बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद का चुनाव होने वाला है। लेकिन इस बार जमीनी हकीकत कोकराझार में बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट की जीत के खिलाफ दिखाई देती है, क्योंकि उन्नीस गैर-बोडो संगठन और करीब चार लाख मुस्लिम मतदाता उसके विरोध में हैं।
विगत 24 अप्रैल को हुए मतदान के बाद से ही वहां तनाव की स्थिति बनी हुई थी। पर फ्रंट के एक नेता द्वारा अपनी हार की आशंका जताए जाने के बाद कोकराझार और बक्सा जिले में औरतों व बच्चों को निशाना बनाया गया और उनके घर जला दिए गए। गैर बोडो समुदाय के प्रति गुस्से का सुबूत यह है कि इस बर्बरता में वन सुरक्षा गार्ड और रेंजर भी शामिल थे।
बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट का चूंकि सत्ताधारी कांग्रेस से गठजोड़ है, लिहाजा यह हत्याकांड असम की तरुण गोगोई सरकार के लिए चिंता का कारण होना चाहिए। लेकिन इससे बेखबर केंद्र की यूपीए सरकार भाजपा को निशाना बनाने में ज्यादा रुचि दिखा रही है। दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल और असम की हालिया चुनावी सभाओं में नरेंद्र मोदी ने बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ जिस तेवर का परिचय दिया, उससे एक जिम्मेदार नेता की छवि बननी तो दूर, उनके बारे में व्याप्त आशंकाएं ही सच मालूम पड़ती हैं। लोगों को सुरक्षा न दे पाना अगर विफलता है, तो हिंसा और हत्या पर राजनीति करना उससे भी बड़ी विडंबना है।