दुनिया भर में किताबों के जरिये सत्ता राजनीति से जुड़े पर्दाफाश 'उचित' या 'सुविधाजनक समय' पर ही किए जाने का चलन है। इसीलिए कांग्रेस के पराभव के दौर में संजय बारु और पीसी पारेख की पुस्तकों की शृंखला में नटवर सिंह की किताब का आना आश्चर्यजनक नहीं है। फर्क सिर्फ यह है कि शुरुआती दो किताबों में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को निशाना बनाया गया था।
जबकि अपनी किताब में नटवर सिंह ने सोनिया गांधी की धज्जियां उड़ाई हैं, और ऐसा करके खुद के साथ हुए 'अपमान' का पूरा बदला चुका लिया है। यह पुस्तक अगर एक राजनीतिक पार्टी के तौर पर कांग्रेस की कमियों को बताती और उसके उत्तरोत्तर पराभव की वजहों का विश्लेषण करती, तो निस्संदेह इसका महत्व होता।
नटवर सिंह ऐसा कर सकते थे, क्योंकि वह बौद्धिक हैं, गांधी परिवार के नजदीकी रह चुके हैं और आधुनिक भारत व वैश्विक राजनीति को भी बहुत करीब से देख चुके हैं। पर अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही कांग्रेस को आईना दिखाकर और अपने बेटे के भाजपा विधायक बनने की पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसा कर उन्होंने अचूक अवसरवादी होने का ही परिचय ज्यादा दिया है।
उनका यह खुलासा जरूर सनसनीखेज है कि सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री पद न स्वीकारने की वजह अंतरात्मा की आवाज नहीं, बल्कि राहुल गांधी की जिद थी। किताब छपने से पहले सोनिया गांधी का उनसे मुलाकात करने जाना और अपनी किताब लिखने का उनका फैसला बताता है कि नटवर के खुलासे में कुछ न कुछ सच्चाई जरूर है। पर कांग्रेस अध्यक्ष को ‘सुपर प्राइम मिनिस्टर’ बताकर वह नया कुछ नहीं कह रहे।
आत्मकथा होने के बावजूद इसमें दूसरों की ही कथा अधिक है और खुद को आईने में देखने की कोशिश कम। वर्ना भ्रष्टाचार के आरोप में कांग्रेस से बाहर होने और अन्य राजनीतिक पार्टियों में भी न टिक पाने के बावजूद किताब में दूसरों को दोषी ठहराने की सोच क्यों है?
ऐसी किताबें सनसनी तो फैला सकती हैं, पर इनका स्थायी मूल्य नहीं होता। इस किताब की प्रतिक्रिया में सोनिया गांधी अगर कोई किताब लिखेंगी, तो उसमें भी ऐसे ही सुविधाजनक सच होंगे।