राजनीतिक रूप से संवेदनशील प्याज के दाम बढ़ने से इस वर्ष चौथी बार विधानसभा चुनावों की तैयारी में जुटीं दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की परेशानी समझी जा सकती है। आखिर 1998 में दिल्ली में भाजपा के हाथ से सत्ता निकलकर उनके हाथ में आई ही थी प्याज के बढ़ते दामों के कारण।
मगर, मुश्किल यह है कि दिल्ली में उन्हीं की पार्टी की सरकार है और उस महाराष्ट्र में भी, जहां की लासलगांव मंडी से पूरे देश में प्याज की कीमतें तय होती हैं। हैरानी की बात यह है कि कृषि मंत्री शरद पवार प्याज के दामों में अचानक आए उछाल से किसी भी तरह परेशान नहीं हैं, और उन्होंने वैसा ही तर्क दिया है, जैसा कि दो साल पहले प्याज के दाम बढ़ने पर दिया था। वह दाम गिरने का भरोसा जरूर जता रहे हैं, लेकिन एक हफ्ते के दौरान ही खुले बाजार में प्याज के दाम बढ़कर चालीस रुपये के आसपास पहुंच गए।
असल में प्याज के कारोबार का बड़ा खेल है, जिसमें जमाखोरों-आढ़तियों से लेकर देश की कृषि नीति तय करने वाले तक शामिल हैं, जिसका खामियाजा किसानों और आम उपभोक्ताओं को उठाना पड़ता है। चूंकि इसकी फसल रबी और खरीफ दोनों मौसमों में होती है और खासतौर से यह वक्त ऐसा होता है, जब खरीफ की फसल खत्म होने को होती है और रबी की फसल आने में वक्त होता है। इसी का फायदा जमाखोर उठाते हैं और प्याज के दाम बढ़ने लगते हैं।
बेशक, खराब मानसून की वजह से उत्पादन में गिरावट आई है, लेकिन यह बात गले नहीं उतरती कि अचानक बाजारों में आपूर्ति कम हो जाए; वह इसलिए कि जनवरी में आपूर्ति सिर्फ तीन फीसदी कम हुई, मगर दाम दोगुने से भी ज्यादा बढ़ गए। यह विडंबना ही है कि सरकार एक ओर तो महंगाई कम नहीं कर पा रही है, दूसरी ओर जो उपाय वह कर सकती है, उसके लिए तैयार नहीं है।
चीन के बाद भारत दुनिया का सबसे बड़ा प्याज उत्पादक ही नहीं, बल्कि एक बड़ा निर्यातक देश भी है। जब-जब प्याज के दाम बढ़ते हैं, इसके लिए न्यूनतम निर्यात मूल्य तय करने का मुद्दा भी उठता है। यदि यह मूल्य तय हो जाए, तो प्याज की घरेलू मांग को नजरंदाज कर विदेश भेजने पर अंकुश लग सकेगा, मगर सरकार इसके लिए तैयार नहीं दिख रही है, लिहाजा प्याज अभी और रुलाएगा!