जिद छोड़कर ईरान ने अपना परमाणु कार्यक्रम सीमित करने की पश्चिमी देशों की शर्त मानी है, तो यह राष्ट्रपति हसन रोहानी के व्यावहारिक नजरिये का सुबूत तो है ही, अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इस समझौते को मूर्त रूप देकर उससे भी अधिक दूरदर्शिता का परिचय दिया है, जिससे पश्चिम एशिया की भू-राजनीति में बड़े बदलाव की उम्मीदें जगी हैं।
ओबामा की यह पहल इसलिए भी सराहनीय है, क्योंकि अपने यहां विपक्षी रिपब्लिकनों के विरोध और इस्राइल और कुछ अरब देशों की नाखुशी के बावजूद उन्होंने ऐसा कदम उठाया है, जिससे एक झटके में अमेरिका-ईरान के बीच रिश्ते सुधर जाने की भी बहुत उम्मीद नहीं है। इसके बावजूद इतिहास ओबामा को इस ऐतिहासिक समझौते के पटकथाकार के रूप में याद तो रखेगा ही।
ईरान के लिए यह अवसर कितना महत्वपूर्ण है, इसका अंदाजा समझौते के ऐलान के बाद तेहरान की सड़कों पर लोगों के उमड़ते हुजूम से लगाया जा सकता था। पश्चिमी देशों की शर्त मानने के बाद अरबों डॉलर की सील हुई संपत्ति तो उसे मिलेगी ही, तेल और गैस के कारोबार, वित्तीय लेन-देन तथा उड्डयन व जहाजरानी के क्षेत्रों में व्याप्त प्रतिबंधों में ढील दी जाएगी। अपने पुराने मित्र राष्ट्र ईरान को प्रतिबंधों से बाहर निकलते देखना भारत के लिए सचमुच सुखद है।
वस्तुतः ईरान पर लगे प्रतिबंधों के दौरान भी भारत के उसके साथ मजबूत कारोबारी रिश्ते थे। समझौते के ऐलान के बाद ही कच्चे तेल के भाव घटे हैं, जो भारत के लिए अच्छी खबर है। फिर ईरान से तेल मंगवाना भारत के लिए सस्ता भी पड़ता है। पर सिर्फ तेल की वजह से नहीं, मध्य एशिया तथा अफगानिस्तान में प्रवेश के लिए भी ईरान हमारे लिए महत्वपूर्ण है। प्रतिबंध में ढील से ईरान में हमारा निर्यात भी बढ़ेगा।
अलबत्ता प्रतिबंध के दौरान ईरान के साथ कारोबार में भारत को जो फायदा होता था, अब लेवल प्लेइंग फील्ड में उतना लाभ शायद ही हो, क्योंकि कारोबारी प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। इसीलिए यह आशंका भी है कि हो न हो, ईरान के फराज-बी गैस फील्ड को विकसित करने की जिम्मेदारी ओएनजीसी के बजाय कहीं यूरोप को न मिल जाए। इसके बावजूद इस समझौते का भारत के लिए महत्व तो है ही।