राजनीतिक दलों में भूमि अधिग्रहण पुनःस्थापना और पुनर्वास विधेयक पर बनी सहमति के बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि इसे संसद के मौजूदा सत्र में ही पारित करा लिया जाएगा।
यह आर्थिक सुधारों की दिशा में बड़ा कदम साबित होगा, क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में भूमि अधिग्रहण को लेकर हुए आंदोलनों और विsवादों के कारण कई महत्वपूर्ण आधारभूत तथा औद्योगिक परियोजनाएं अटकी हुई हैं।
दरअसल विकास की इस अवधारणा को नकारा नहीं जा सकता कि नई परियोजनाओं को यदि अमलीजामा पहनाना है, तो जमीन अधिग्रहण उसकी पहली शर्त है। पर विकास का दूसरा पहलू विस्थापन भी है और यहीं से मुश्किल शुरू होती है।
हैरान करने वाली बात है कि हमारा देश अब भी 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून से चिपका हुआ है, जो भू स्वामियों और किसानों को उनकी जमीन से बेदखल करता है, पर पुनर्वास की उचित व्यवस्था नहीं करता।
बढ़ते शहरीकरण के साथ इस कानून ने विसंगतियां भी पैदा कीं, जिनका खामियाजा निचले तबके के लोगों को उठाना पड़ा। खासतौर से छोटे किसानों और भू स्वामियों पर दोहरी मार पड़ी।
एक तो उनके हाथ से जमीन निकल गई और दूसरा उन्हें समुचित मुआवजा और रोजगार भी नहीं मिला, जिससे उनके अस्तित्व का संकट गहराता चला गया।
प्रस्तावित कानून में जो संशोधन स्वीकार किए गए हैं, उससे शहरी क्षेत्रों के भू स्वामियों को दो गुना और ग्रामीण क्षेत्रों के भू स्वामियों को चार गुना मुआवजे की बात है और जमीन का स्वामित्व किसानों के नाम पर ही रहेगा।
पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के मामले में 70 फीसदी और निजी औद्योगिक परियोजनाओं के लिए 80 फीसदी भू स्वामियों की सहमति को भी अधिग्रहण का आधार बनाया गया है, जो पहले से व्यापक है।
इसके बावजूद यह ध्यान रखने की जरूरत है कि ऐसे किसी भी बहुमत या सहमति के फैसले में अक्सर छोटे किसान और भू स्वामियों के हित नजरंदाज हो जाते हैं। इसके लिए न्यूनतम भू स्वामित्व के साथ मुआवजे की कोई अलग से सीमा तय की जा सकती है।
इस कानून पर बात करते हुए नहीं भूलना चाहिए कि हमारे देश में पहले ही लाखों भूमिहीन हैं, जिनका रोजगार खेती या वनोपज संग्रह से जुड़ा हुआ है। क्या विकास की नई अवधारणा में ऐसे लोगों के हित भी ध्यान में रखे जाएंगे?