अंबेसडर का उत्पादन बंद होना एक गाड़ी का चलन से बाहर होना भर नहीं है, यह उस कार का इतिहास बन जाना भी है, जो करीब आधी सदी तक इस देश में ताकत, समृद्धि और आत्मनिर्भरता की निशानी थी। बंद अर्थव्यवस्था की ऊबड़-खाबड़ सड़क पर हिचकोले खाती इस कार को हमने हालांकि उन्हीं अंग्रेजों से लिया था, जिससे आजादी हासिल की थी। लेकिन अपने आकार-प्रकार, बैठने की आरामदेह व्यवस्था और किसी भी सड़क पर चलने के माकूल होने की वजह से यह हमारे राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक बन गई थी।
कोलकाता स्थित हिंद मोटर कंपनी ने काले रंग की पहली अंबेसडर कार तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को भेंट की थी और उसके बाद ही यह नई दिल्ली के लुटियन्स जोन में सत्ता राजनीति और नौकरशाही का अधिकृत वाहन बनी। पंखे, पर्दे और लाल-नीली बत्तियों से सुसज्जित अंबेसडर में बैठना कुछ दशक पहले तक भी लोगों की महत्वाकांक्षाओं में शामिल था, तो इसलिए कि तब यह सरकारी अधिकारियों का इकलौता वाहन थी। कोटा और लाइसेंस के उस दौर में कोलकाता स्थित कंपनी में रोजाना हजारों अंबेसडर कारें बनती थीं, इसके बावजूद इच्छुक ग्राहकों तक पहुंचने में उन्हें एक साल लग जाते थे।
अंबेसडर का उत्पादन मुक्त अर्थव्यवस्था को लागू करने के करीब तेईस साल बाद बंद हुआ है, पर उसका यह हश्र हमारी पांरपरिक सोच और नजरिये का जितना सटीक रूपक है, उतना कोई और नहीं। इसे शुरुआती चुनौती बीती सदी के सातवें-आठवें दशक में मारुति के आने के बाद से ही मिलने लगी थी, पर इसने समय के मुताबिक बदलना स्वीकार नहीं किया। उदार आर्थिक नीति लागू होने के बाद जब सस्ती और शानदार कारों से हमारी सड़कें पटने लगीं, तब घटिया धातु की बॉडी, बेकार एयकंडीशनर, प्लास्टिक के पेच और महंगी कीमत होने के कारण इसकी मांग दिनोंदिन कम होती जा रही थी। इसी वजह से बाद में यह सरकारी खरीद के दायरे से भी बाहर हो गई।
यह विडंबना हो सकती है कि आजाद भारत की इस शुरुआती पहचान को घाटे से उबारने में किसी ने दिलचस्पी नहीं ली, पर इस हश्र के लिए वही खुद सर्वाधिक जिम्मेदार है। सच यह है कि बाजार की शर्तों पर खरी न उतरने के कारण बाजार ने ही उसे चलन से बाहर कर दिया है।