बयालीस वर्ष तक कोमा में रहने के बाद दुनिया छोड़ देने वाली मुंबई के केईएम अस्पताल की पूर्व नर्स अरुणा शानबाग को ऐसी यातना झेलनी पड़ी, जिसने हमारी सामूहिक चेतना को झकझोर कर रख दिया। यह विडंबना ही है कि उन पर जानलेवा हमला और यौन हिंसा करने वाला अस्पताल का वार्ड बॉय सोहनलाल अदालत से मिली सजा काटने के बाद सामान्य जीवन जीने के लिए जेल से बाहर आ गया, मगर अरुणा को कभी न्याय नहीं मिल सका।
नवंबर, 1973 को हुई बर्बरता के बाद से वह कभी होश में नहीं आ सकीं। दिल्ली में हुए निर्भया कांड के बाद न केवल बलात्कार की परिभाषा कड़ी की गई है, बल्कि ऐसे मामलों में सजा के प्रावधान भी और सख्त किए गए हैं। मगर अरुणा के साथ यौन हिंसा करने वाले सोहनलाल पर जानलेवा हमला और डकैती के मामले तो चले और उसे सजा भी हुई, लेकिन उस पर बलात्कार या यौन हिंसा का मामला नहीं चलाया गया! शायद उस वक्त की सामाजिक संरचना और दबाव में अस्पताल प्रबंधन को यह उचित लगा था।
मगर उस हादसे ने अरुणा के अस्तित्व को खत्म ही कर दिया, और यदि केईएम अस्पताल के उनके सहकर्मियों और नर्सों ने उनकी सेवा नहीं की होती, तो वे इतने लंबे समय तक जीवित भी नहीं रह पातीं। वास्तव में बलात्कार और हिंसा के साथ ही अरुणा के मामले का एक और पहलू है और वह है 'इच्छामृत्यु'।
उनके साथ हुई ज्यादती के बाद अरुणा न केवल शारीरिक रूप से निष्क्रिय हो गई थीं, बल्कि उनकी चेतना दोबारा नहीं लौट सकी। इससे उन्हें इच्छामृत्यु देने की मांग भी उठी थी, लेकिन अदालत ने इससे इन्कार कर दिया। अलबत्ता उनके मामले की सुनवाई करते हुए सर्वोच्च अदालत ने देश में पैसिव यानी निष्क्रिय इच्छामृत्यु की इजाजत दे दी, जिसमें इलाज बंद कर दिया जाता है।
इससे भारत उन देशों में शामिल हो गया, जहां किसी न किसी रूप में इच्छामृत्यु को मंजूरी है। वैसे इच्छामृत्यु के मामले में नैतिकता और मानवीय पक्ष सबसे बड़ी बाधा हैं और यह संविधान प्रदत्त जीने के अधिकार का प्रतिकार भी करता है। फिर यह नहीं भूलना चाहिए कि दुनिया के कुछ ही देशों में इच्छामृत्यु को कानूनन वैध माना गया है। वास्तव में एक सभ्य समाज में इच्छामृत्यु के अधिकार से कहीं अधिक जरूरी सम्मानजनक ढंग से जीने के अधिकार की रक्षा होनी चाहिए।