संसद के भीतर सत्तारूढ़ एनडीए और विपक्ष के बीच टकराव तो खत्म होता नहीं दिख रहा है, बल्कि हंगामे की वजह से लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने अप्रत्याशित कदम उठाते हुए कांग्रेस के 25 सदस्यों को निलंबित कर दिया है। कांग्रेस ललित मोदी के मामले में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और व्यापम घोटाले के मामले में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के इस्तीफे से कम पर तैयार नहीं है।
यदि कांग्रेस सिर्फ इसलिए संसदीय कार्यवाही नहीं चलने दे रही है, क्योंकि यूपीए के कार्यकाल के दौरान भाजपा ने भी ऐसा ही किया था, तो इसे तर्कसंगत नहीं कहा जा सकता। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने राज्यसभा में शोर-शराबे के बीच बयान देने की कोशिश जरूर की, लेकिन सच यह है कि सरकार के प्रबंधक भी अब तक कोई बीच का रास्ता नहीं निकाल सके हैं। ऐसा लगता है, मानो भाजपा और कांग्रेस ने पिछली लोकसभा की तुलना में अपनी भूमिकाएं बदल ली हैं। जबकि संसद को सुचारु रूप से चलाने की जिम्मेदारी सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों की होती है।
ऐसा नहीं है कि संसद में यह स्थिति कोई पहली बार आई है, लेकिन संसद को ठप कर देने की यह बढ़ती प्रवृत्ति किसी के लिए अच्छी नहीं है। हैरत नहीं होनी चाहिए कि लोकसभा के जिस नियम 374 (ए) के तहत अध्यक्ष ने कांग्रेसी सदस्यों को निलंबित किया है, भारत के संसदीय इतिहास में उसका पहली बार प्रयोग पिछली संसद में ही किया गया था, जब तत्कालीन अध्यक्ष मीरा कुमार को तेलंगाना के मसले पर कुछ सदस्यों को निलंबित करना पड़ा था। यह चिंता की बात है कि सदस्य लोकसभा अध्यक्ष के निर्देशों को मानने को तैयार नहीं दिखते। मसलन, महाजन ने इसी सत्र में आसंदी के नजदीक शोर-शराबा करने और प्लेकार्ड लेकर प्रदर्शन करने से न केवल मना किया था, बल्कि कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी को एक दिन के लिए निलंबित भी कर दिया था।
बेशक इस सत्र में अब अधिक दिन नहीं बचे हैं, मगर लोकसभा अध्यक्ष ने संकेत दिए हैं कि वह कांग्रेसी सदस्यों के निलंबन पर पुनर्विचार कर सकती हैं; सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों को ही इसे एक मौके की तरह देखना चाहिए, ताकि जीएसटी जैसे अहम विधेयक पर कुछ तो बात आगे बढ़े।