पिछले लोकसभा चुनाव में देश की छह राष्ट्रीय पार्टियों को मिले चंदे और उनके द्वारा चुनाव प्रचार में किए गए खर्च से संबंधित जो आंकड़े सामने आए हैं, वह यह समझने के लिए काफी हैं कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में चुनाव कितने महंगे होते जा रहे हैं।
एक दशक पहले 2004 में हुए लोकसभा चुनाव की तुलना में इन छह दलों के खर्च में जहां 386 फीसदी की वृद्धि हो गई, वहीं इन्हें मिलने वाला चंदा भी चार सौ फीसदी से अधिक बढ़ गया! इसमें चुनाव आयोग द्वारा खर्च किए गए 3,500 करोड़ रुपये और सुरक्षा बलों पर किया गया खर्च शामिल ही नहीं है। इसके साथ ही इसमें चुनाव आयोग में पंजीबद्ध उन दर्जनों क्षेत्रीय और राज्य स्तर पर मान्यता प्राप्त दलों के ब्योरे भी शामिल नहीं हैं, जिनकी कई राज्यों में सरकारें तक हैं।
निश्चय ही चुनाव खर्च बढ़ने के लिए महंगाई को जिम्मेदार माना जा सकता है, पर चुनावी राजनीति में जिस तरह से धनबल का प्रभाव बढ़ता जा रहा है, वह चिंता की बात है। खुद भाजपा के दिवंगत नेता गोपीनाथ मुंडे ने स्वीकार किया था कि उन्होंने 2009 के लोकसभा चुनाव में आठ करोड़ रुपये खर्च किए थे। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि चुनाव में होने वाला खर्च काले धन के प्रवाह का बड़ा जरिया है।
काले धन की जांच के लिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित की गई जस्टिस एम बी शाह की अगुआई वाली विशेष जांच समिति के समक्ष भी यह मुद्दा आ चुका है कि जब तक राजनीतिक दलों को मिलने वाले बेनामी चंदों पर अंकुश नहीं लगता काले धन को रोकना मुश्किल होगा। हैरत नहीं होनी चाहिए कि राजनीतिक पार्टियां संसद के बाहर और भीतर काले धन को लेकर काफी शोर-शराबा मचाती हैं, लेकिन राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता के मुद्दे पर अक्सर चुप कर जाती हैं।
वास्तव में राजनीतिक दलों को उन्हें मिलने वाले चंदे के बारे में सालाना चुनाव आयोग को और आयकर विभाग को रिटर्न के जरिये बताना होता है। लेकिन मुश्किल यह है कि जन प्रतिनिधत्व कानून के तहत वह 20,000 रुपये से कम के चंदे पर स्रोत बताने के लिए बाध्य नहीं हैं। इससे चंदे के असली स्रोत का पता ही नहीं चलता। जाहिर है, राजनीतिक चंदे में जब तक पारदर्शिता नहीं लाई जाती, धनबल के प्रभाव को नियंत्रित करने की बात बेमानी ही साबित होनी है।