यह वाकई बड़ी उपलब्धि है कि जिस पड़ोसी देश से हमारी सबसे लंबी सीमा लगती है, उसके साथ सीमा समस्याओं का निपटारा हो चुका है। दशकों से अटके पड़े भू-सीमा समझौते पर मुहर लगने से दोनों तरफ की बस्तियों में रहने वाले हजारों लोगों की नागरिकता का मसला हल हुआ है, तो पूर्वोत्तर भारत के विकास के लिए भी इसे अहम कदम बताया जा रहा है।
गौरतलब है कि भू-सीमा समझौते पर आगे बढ़ने की पृष्ठभूमि पूर्व की मनमोहन सिंह सरकार के समय तैयार हुई थी, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने असम समेत पूरे पूर्वोत्तर के हितों का ध्यान रखते हुए प्रशंसनीय राजनीति का परिचय दिया। भू-सीमा समझौते के अतिरिक्त दोनों देशों को जोड़ने, बांग्लादेश की आर्थिक मदद करने के साथ आपसी व्यापार बढ़ाने और आतंकवाद को निर्मूल करने की दिशा में कई साझा घोषणाएं की गई हैं।
उसमें भी बांग्लादेश को दो अरब डॉलर की लाइन ऑफ क्रेडिट देने का फैसला खासकर रेखांकित करने लायक है, जो एक तरफ जहां पड़ोसी देश की बहुत बड़ी मदद है, दूसरी ओर, इससे मेक इन इंडिया को भी गति मिलेगी। तीस्ता समझौता न होने के कारण बांग्लादेश में थोड़ी हताशा जरूर है, यद्यपि भारत ने जल्दी ही इस पर भी मुहर लगाने का संकेत दिया है। इसके अलावा ढाका अभी थोड़ा ठहरकर संभवतः यह भी देखना चाहता है कि दोनों देशों के बीच नए रास्तों के खुलने और बाजार के बढ़ने का उसे सचमुच कितना लाभ मिलता है।
अपने से बड़े और शक्तिशाली देशों के साथ रिश्ता बनाते हुए जैसी आशंका तुलनात्मक रूप से छोटे देशों को होती है, कमोबेश वही आशंका बांग्लादेश को हो, तो आश्चर्य नहीं। लेकिन बांग्लादेश का तो जन्म ही भारत की सहायता और समर्थन से हुआ है, और खालिदा जिया के कार्यकाल को छोड़ दें, तो दोनों देशों के संबंध हमेशा सौहार्दपूर्ण रहे हैं। भारत अगर बांग्लादेश की बेहतरी का इच्छुक रहा है, तो हाल के वर्षों में शेख हसीना ने अपनी धरती को भारत-विरोधी आतंकवाद का केंद्र बनने से जिस तरह रोका है, वह काबिल-ए-तारीफ है।
यह उम्मीद की जानी चाहिए कि भू-सीमा समझौते को मूर्त रूप देने के बाद दोनों देश अब सहयोग और भरोसे के नए रास्ते पर चलेंगे। बल्कि ये दोनों पड़ोसी कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ते हैं, तो यह दूसरे पड़ोसियों को भी सहयोग के ऐसे ही रिश्ते में बंधने के लिए प्रेरित करेगा।