पाकिस्तान के चर्चित टेलीविजन पत्रकार हामिद मीर पर हुआ हमला सच को निशाना बनाने का एक और जघन्य उदाहरण है। यह उस देश की कड़वी हकीकत है, जिसे पत्रकारों के लिए सर्वाधिक खतरनाक मुल्कों में गिना जाता है, और जहां पिछले साल दस पत्रकार गोलियों का निशाना बने थे।
पिछले ही महीने लाहौर में वरिष्ठ टेलीविजन एंकर रजा रूमी पर हमला हुआ था, जिसमें उनके ड्राइवर की मौत हो गई थी। उस हादसे के बाद पाकिस्तान सरकार ने पत्रकारों की सुरक्षा के लिए एक आयोग गठित करने और तालिबान के साथ बातचीत में प्रेस की स्वतंत्रता को शामिल करने की बात कही थी। लेकिन इस दिशा में कुछ सार्थक हो पाता, इससे पहले ही अब हामिद मीर को निशाना बनाया गया।
रक्षा खरीद में सत्ता के शीर्ष पर आसीन व्यक्ति की लिप्तता का खुलासा करने का जोखिम उठाकर या पाक अधिकृत कश्मीर में आतंकवादियों की मौजूदगी बताने का साहस दिखाकर हामिद मीर ने एक युद्धजर्जर देश में पत्रकारिता के पेशे को नया अर्थ दिया है। वह अमेरिकी ड्रोन हमलों का भी यह कहते हुए विरोध करते रहे हैं कि ये निर्दोषों को निशाना बनाते हैं। अपनी साहसपूर्ण खोजी पत्रकारिता और सुरक्षा मामलों के सटीक विश्लेषण के लिए वह देश के बाहर चर्चित-प्रशंसित हैं, लेकिन अपने ही मुल्क में बार-बार प्रतिबंध, धमकी और हमले का सामना करने को अभिशप्त हैं!
पाकिस्तान में पत्रकारों के साथ दरअसल दोहरा जोखिम है; कट्टरवादी हिंसा की निंदा करने पर वे आतंकियों के निशाने पर आ जाते हैं, तो शासन की आलोचना करने पर सेना और आईएसआई उन्हें नहीं बख्शती। हाल के वर्षों में जियो टीवी पर अपने लोकप्रिय टॉक शो में हामिद मीर ने बलूचिस्तान में सेना के निरंकुश तौर-तरीकों पर सवाल उठाए हैं। इससे पहले खुफिया एजेंसी की कारगुजारी की भी उन्होंने पोल खोली है।
ऐसे में, यही लगता है, जिसके बारे में खुद वह पहले ही अपने नजदीकी लोगों को आगाह कर चुके थे, कि कराची में उन पर हुए हमले में आईएसआई का हाथ है। लिहाजा पाकिस्तान सरकार का सिर्फ हरकत में आना ही काफी नहीं है, जरूरी यह है कि वह इस हमले की जांच करवाए, ताकि सच्चाई का पता चल सके। इसके अलावा पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कदम उठाने में भी देर नहीं करनी चाहिए।