हेरात स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास पर हमले के करीब दस दिन बाद उसी राज्य में एक भारतीय के अपहरण से साफ है कि अफगानिस्तान की बदलती परिस्थिति भारत के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण हो सकती है। हालांकि अपहरण की गुत्थी के सुलझने के आसार हैं; इस सिलसिले में एक गिरफ्तारी भी हुई बताई जाती है।
तमिलनाडु निवासी प्रेम कुमार की रिहाई के लिए एमडीएके के मुखिया वाइको ने भी नरेंद्र मोदी सरकार पर दबाव बनाया है। पर हमला और अपहरण की इन दो घटनाओं से जो बात शीशे की तरह साफ है, वह यह कि नाटो और अमेरिकी सैनिकों की अफगानिस्तान से पूरी तरह वापसी के पहले ही पाकिस्तान वहां अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है और उसके निशाने पर भारत है। भारतीय वाणिज्य दूतावास पर हमले को खुद अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई लश्कर की करतूत बता चुके हैं, और अब हेरात के गर्वनर भारतीय नागरिक के अपहरण के पीछे तालिबान का हाथ बता रहे हैं।
लश्कर और तालिबान का मजबूत होकर उभरना भविष्य में वहां क्या गुल खिला सकता है, इसकी सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है। इस बीच ओबामा प्रशासन द्वारा तालिबान की कैद से अपने एक सेनाधिकारी सार्जेंट ब्रोवे बर्गडैल को छुड़ाने के फैसले से, जिसके बदले में ग्वांतनामो बे की जेल में बंद तालिबान के पांच दुर्दांत आतंकियों को रिहा किया गया, जाहिर है कि इस क्षेत्र में अमेरिका की भूमिका अपने स्वार्थों से संचालित है और आतंकवाद खत्म करना उसके एजेंडे में उतना महत्वपूर्ण नहीं है।
दरअसल यहीं से अफगानिस्तान में भारत की मुश्किलें शुरू होती हैं। भारत अब तक अफगानिस्तान को मानवीय सहायता देने के अलावा उसे विकास की मुख्यधारा में लाने की दिशा में सहयोग करता रहा है। जबकि जल्दी ही पदमुक्त होने वाले अफगान राष्ट्रपति करजई नई दिल्ली से प्रभावी सैन्य सहयोग के आकांक्षी हैं। विदेशी सैनिकों की वापसी के बाद काबुल पर तालिबान और लश्कर का वर्चस्व हो जाए, यह भारत कतई नहीं चाहेगा।
दूसरी ओर, यह भी सच है कि काबुल के साथ मजबूत रक्षा संबंध बनाना इस्लामाबाद को नागवार गुजरेगा। लेकिन अपने स्थायी हित में नवनिर्वाचित नरेंद्र मोदी सरकार को जल्दी ही अफगानिस्तान से संबंधित अपनी विदेश नीति के बारे में गंभीरता से सोचना तो पड़ेगा ही।