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ये 'कमिटमेंट फोबिया' क्या है?

Tue, 09 Apr 2013 01:49 PM IST
हिमानी दीवान
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डर, हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा है। किसी को ऊंचाई से डर लगता है, किसी को पानी से, किसी को आग से तो कोई डरता है कमिटमेंट से। कमिटमेंट यानी जिम्मेदारी, जवाबदेही और प्रतिबद्धता।
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लंबे समय तक एक चीज की जिम्मेदारी? निभाने और किसी चीज का वादा करने से लगने वाले डर को कमिटमेंट फोबिया कहा जाता है। यह फोबिया व्यक्ति की जिंदगी के किसी भी हिस्से को प्रभावित कर सकता है, लेकिन खासतौर पर इसका असर लॉन्ग टर्म रिलेशनशीप को लेकर व्यक्ति की प्रतिक्रिया के रूप में देखा जाता है।

अब तक इस फोबिया से जुड़े मामले पश्चिमी देशों में ज्यादा सामने आते रहे हैं, लेकिन अब भारत में इसका  असर दिखने लगा है। लिव-इन रिलेशनशीप बढ़ने और शादी की संस्था में युवाओं की घटती दिलचस्पी का एक कारण कमिटमेंट फोबिया ही है।
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इस फोबिया के प्रभाव में आने से न सिर्फ व्यक्ति की निजी जिंदगी पर असर होता है बल्कि प्रोफेशनल जिंदगी में भी कई समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

कैसा है ये डर
कमिटमेंट फोबिया वास्तव में गलत फैसले लेने और लंबे समय तक उस फैसले में बंधे रहने का डर है। यह डर धीरे-धीरे व्यक्ति के रोजमर्रा के फैसलों को प्रभावित करता है और व्यक्ति कमिटमेंट फोबिक बन जाता है।

यह फोबिया सिर्फ प्यार या शादी जैसे निजी संबंधों ही नहीं बल्कि कार या घर लेने, यूनिवर्सिटी  में दाखिला या नौकरी बदलने जैसे फैसलों में भी शामिल हो जाता है।

ऐसे पहचानें
कमिटमेंट फोबिया से ग्रस्त व्यक्ति को हमेशा ऐसा लगता है कि वह दूसरों से कोई वादा नहीं कर सकता। ऐसे लोग किसी भी रिलेशनशीप में बंधने से भी डरते हैं।

ऐसी स्थिति में व्यक्ति में कुछ व्यावहारिक लक्षण देखे जा सकते हैं। हालांकि ऐसे सिर्फ 20 या 30 प्रतिशत ही मामले होते हैं, जिनमें कि कमिटमेंट फोबिया से ग्रस्त व्यक्ति को कोई शारीरिक परेशानी हो जैसे अनिद्रा या अत्यधिक तनाव, लेकिन फिर भी इसके लक्षणों को पहचानना जरूरी है। जैसे-

-बार-बार सवालों को टालना या गोल-मोल जवाब
-अचानक शक करने लगना
-अनिश्चित रहना
-बिना किसी वजह के झगड़ा करना
-बात न मानना
-आधी-अधूरी बातें बताना
-साथ में तसवीर न खिंचाना
-नाखून चबाना
-बड़ब़ड़ाना
-नींद न आना
-चिड़चिड़ापन

कहीं ये कारण तो नहीं
कमिटमेंट फोबिया भी दूसरी तरह के फोबिया के तरह ही है। यह एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें मस्तिष्क हमें हमारे फैसले के नतीजों से बचाव के लिए प्रेरित  करता है।

उदाहरण के लिए यदि एक व्यक्ति के पूर्व अनुभव में ऐसी कोई बात हुई हो, जिसमें उसके कोई फैसला लेने पर उसे नुकसान उठाना पड़ा हो, तो वह  दोबारा ऐसा होने के डर से फैसला लेने की जिम्मेदारी से अपना बचाव करने लगता है।

इसके अलावा पारिवारिक परिस्थितियां, माता-पिता या घर में किसी के  अलगाव या आपसी लड़ाई-झगड़ों को देखना और सामाजिक ताने-बाने से ताल-मेल न बिठा पाना भी कमिटमेंट फोबिया का एक कारण हो सकता है।

आप खुद ही हैं इसका उपाय
कमिटमेंट फोबिया एक ऐसी स्थिति है, जिसमें व्यक्ति एक ही चीज से खुद को बांध लेता है। इसलिए इससे बचने का सबसे आसान और सही तरीका है, ऐसा कुछ करना जिससे अपने मन के बनाए हुए भ्रम से बाहर निकलने में मदद मिले।

सबसे पहले खुद को यह समझाना बहुत जरूरी है कि एक बार गलत फैसला होने का मतलब यह नहीं होता कि हर बार आपको वही अनुभव होगा।

सामान्य तौर पर कमिटमेंट फोबिया से बाहर निकलने के लिए आप अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से बातचीत करने का उपाय अपना सकते हैं। लेकिन ज्यादा समस्या होने पर मनोचिकित्सक से परामर्श लेना ही सही होगा।

क्या कहते हैं एक्सपर्ट
वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. रिपन सिप्पी के अनुसार, सामान्य तौर पर इस तरह के फोबिया को दूर करने का सबसे पहला उपाय है बातों को मन में न रखें।

जिस किसी से भी बात करने से आपको अच्छा महसूस हो, उससे अपने मन की उलझन जरूर बांटें। ऐसा न करने पर ही अक्सर लड़कों को बुरे व्यसनों सिगरेट और शराब इत्यादि की लत लग जाती है।

वहीं लड़कियां ऐसी समस्या के दौरान अत्यधिक तनाव, उदासी और चिड़चिड़ेपन की शिकार हो जाती हैं। समस्या ज्यादा बढ़ने पर जब लोग मनोचिकित्सक के पास जाते हैं तो वहां उन्हें काउंसिलिंग और साइकोथैरेपी के जरिये इस फोबिया से बाहर निकाला जाता है।
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कमिटमेंट फोबिया को दूर करने के लिए कोई दवाई नहीं है, इससे सिर्फ सोच बदलकर ही बचा जा सकता है।
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