पिछले वर्ष बर्फ संचय कम होने और गर्मी में जल्द पिघल जाने की वजह से अभी नदियों में जल स्तर, जल प्रवाह कम है, लेकिन आने वाले मई-जून माह में तेज गर्मी के बाद इस बार अच्छी पड़ी बर्फ नदियों में बेहतर जल स्तर की वजह बनेगी।
उत्तराखंड स्पेस एप्लिकेशन सेंटर यानी यू-सैक ने मास-बैलेंस स्टडी शुरू की है। इसके तहत एनडीएसआई का आंकड़ा बीते साल के मुकाबले जनवरी, फरवरी, मार्च में 54 फीसदी अधिक बर्फ जमने की तसदीक कर रहा है।
गर्मियों में ग्लेशियर के पिघलने से नदियों के जल स्तर में बेशक बढ़ोतरी दर्ज की जाती है, लेकिन कई बार ऐसा बस थोड़े समय के लिए होता है।
लंबी अवधि में इससे नदियों के प्रवाह में कमी देखने को मिलती है, क्योंकि बर्फ की जमावट अमूमन कम रह जाती है। लेकिन इस बार अच्छी बर्फ गिरने की वजह से नदियों में पानी और जलापूर्ति बेहतर रहने की उम्मीद है।
यह है मास-बैलेंस स्टडी
इस स्टडी के दौरान हर साल दिसंबर माह से मार्च माह तक बर्फ गिरने, इसकी जमावट, जबकि पोस्ट मानसून पीरियड में बर्फ के पिघलने की दर रिकार्ड की जाती है।
एनडीएसआई का सबब
एनडीएसआई नार्मल डिफरेंस स्नो इंडेक्स है। इसके प्राडक्टर के तहत अलकनंदा, भागीरथी और यमुना बेसिन के स्नो कवर को शामिल किया गया है।
अच्छी बर्फ से आम लोगों, किसानों समेत हर वर्ग को लाभ पहुंचेगा।
-डा. एमएम किमोठी, निदेशक, उत्तराखंड स्पेस एप्लिकेशन सेंटर
हिमाचल के ग्लेशियरों पर बन रही हैं झीलें
सतलुज बेसिन में ग्लेशियरों के पिघलने से 38 छोटी-बड़ी झीलें बनी हैं। इनमें से 14 हिमाचल और बाकी तिब्बत में हैं। सतलुज बेसिन में 334, चिनाब में 457 और रावी में 217 ग्लेशियर हैं।
हिमाचल में इनका कुल क्षेत्र 2077 से घटकर तकरीबन 1628 वर्ग किलोमीटर रह गया है। आधी सदी में यहां ग्लेशियरों का 21 फीसदी क्षेत्र घटा है।
ग्लेशियर छोटा शिगड़ी, बड़ा शिगड़ी, त्रिलोकीनाथ, ब्यास कुंड और मणिमहेश लगातार घट रहे हैं। यह तथ्य स्पेस एप्लीकेशन सेंटर अहमदाबाद और हिमाचल प्रदेश विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण परिषद शिमला अध्ययन में सामने आए हैं।