रविवार को गोवा में भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की ताजपोशी हुई और सोमवार को भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने पार्टी के अहम पदों से इस्तीफा दे दिया।
सियासी गलियारों और मीडिया में इस घटनाक्रम को आडवाणी बनाम मोदी के रूप में पेश किया जा रहा है। लेकिन यह आधा सच है। आडवाणी की सीधी लड़ाई आरएसएस और पार्टी की उन नीतियों से है, जिनके कारण वह लगातार हाशिए पर जा रहे थे। आइए गौर करें आडवाणी के इस्तीफा देने की तीन बड़ी वजहों परः
1. चुनाव अभियान समिति में उपेक्षा
आडवाणी को नरेंद्र मोदी के पार्टी में बढ़ते कद से इतनी दिक्कत नहीं थी, जितना चुनाव अभियान समिति में उनकी बात की अनदेखी से हुई। वह चाहते थे कि चुनाव अभियान समिति में उनके करीबी नेताओं को भी जगह मिले, लेकिन मोदी की ताजपोशी के वक्त ऐसा कोई ऐलान नहीं किया गया।
इसके अलावा उनका कहना था विधानसभा चुनावों के लिए राज्य चुनाव समिति का गठन हो, लेकिन भाजपा ने ऐसा भी नहीं किया। भाजपा को करीब से जानने वाले वरिष्ठ पत्रकार के जी सुरेश का कहना है, 'इन दो बातों के अलावा आडवाणी चाहते थे कि मोदी को इस समिति का चेयरमैन नहीं, बल्कि संयोजक बनाया जाए, लेकिन आरएसएस के दबाव की वजह से राजनाथ ने उन्हें समिति का अध्यक्ष बनाया, जिससे आडवाणी बिफरे हैं।'
2. मोदी के भाषण से नाम गायब
जानकार यह भी मानते हैं कि भाजपा में यह सारा बवाल इसलिए मचा, क्योंकि पार्टी और आरएसएस के जटिल रिश्तों को ठीक से संभाला नहीं गया। लेकिन एक चूक मोदी से भी हुई। उन्होंने रविवार को ताजपोशी के बाद जब शाम को भाषण दिया, तो तमाम नेताओं का जिक्र किया, लेकिन आडवाणी का नाम लेना भूल गए।
सुरेश के मुताबिक, 'आडवाणी केवल भाजपा नहीं, बल्कि देश के बड़े नेता है, ऐसे में उन्हें पूरी तरह नजरअंदाज करना सही नहीं था।' हालांकि, मोदी ने आडवाणी से बातचीत होने और उनका आशीर्वाद लेने की बातें कहीं, लेकिन भाषण में हुई इस चूक ने पार्टी के वरिष्ठ नेता का पारा चढ़ा दिया।
3. आरएसएस को अपने कद का अहसास कराना
वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश भी इस बात से सहमत हैं कि आरएसएस के तौर-तरीके भी अजीबोगरीब रहे हैं। कभी उसने मोदी का विरोध किया, तो आज समर्थन कर रहा है।
उन्होंने कहा, 'आडवाणी संगठन के माहिर माने जाते हैं। लेकिन पार्टी में अब संगठन के पंडितों की पूछ घट रही है और मोदी जैसे नेता बनाए और पेश किए जा रहे हैं। आरएसएस उन्हें जिन्ना विवाद के वक्त से ही पसंद नहीं करता।'
यह मुमकिन है कि आडवाणी ने आरएसएस को अपने कद का अहसास कराने के लिए यह दांव खेला हो। अपने इस्तीफे में श्यामा प्रसाद मुखर्जी, नानाजी और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे दिग्गजों का जिक्र कर उन्होंने पार्टी के अतीत और उसमें अपनी भूमिका को रेखांकित करने की कोशिश की।
इस टकराव का हल क्या होगा?
भाजपा गहरी मुश्किल में है। आडवाणी इस्तीफा देकर पलटे, तो साख में बट्टा लगेगा और मोदी को कमान देने से जुड़ा कदम भी पीछे खींचा नहीं खींचा जा सकता।
सुरेश ने कहा, 'ऐसा नहीं कि आडवाणी भाजपा से अलग होना चाहते हैं। इसलिए उन्होंने पार्टी से इस्तीफा नहीं दिया है। वह नाराज हैं, क्योंकि उनकी सार्वजनिक उपेक्षा की गई। इस मसले का हल यह है कि दोनों पक्ष कुछ समझौते करें।'
यह साफ है कि भाजपा मोदी का नाम अब वापस नहीं लेगी। आरएसएस ने सोच-समझकर यह कदम उठाया है। हां, पार्टी इतना कर सकती है कि चुनाव अभियान समिति में आडवाणी के करीबी नेताओं को जगह दे या फिर प्रदेश चुनाव समिति का गठन करे।
हालांकि, दूसरे जानकार मानते हैं कि अब पार्टी नहीं बदलेगी, आडवाणी को बदलना होगा। उर्मिलेश का कहना है, 'आरएसएस और भाजपा के जटिल रिश्तों के कारण ऐसे मसले आगे भी आएंगे। मौजूदा संकट का कोई रेडीमेड समाधान नहीं हो सकता। लेकिन यह साफ है कि आडवाणी को अपने एजेंडे और तौर-तरीके बदलने होंगे, तभी आरएसएस के साथ उनकी पटरी मेल खाएगी, वरना हालात खराब होंगे।'
आडवाणी की चतुराई
क्या मौजूदा घटनाक्रम ने आडवाणी के लिए प्रधानमंत्री के कमरे के दरवाजे बंद हो गए हैं। जानकारों का मानना है कि इस बारे में अभी कोई कयास नहीं लगाए जा सकते, क्योंकि देश की सियासत का मिजाज ऐसा है कि कोई भी नेता पल भर में पीएम का दावेदार बनकर उभर सकता है।
लेकिन यह साफ है कि आडवाणी ने जो कदम सोमवार को उठाया, उसमें भी इस बात का ख्याल रखा। उन्होंने तीन पदों से इस्तीफा जरूर दिया, लेकिन इसका पीएम पद के दावे पर कोई कसर नहीं होगा। वह भाजपा में हैं, संसद के सदस्य बने हुए हैं और एनडीए में भी बरकरार हैं। ऐसे में साफ है कि पीएम पद की ख्वाहिश अब भी जिंदा है।