फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

पेशे जो दम तोड़ रहे हैं....

Sun, 14 Sep 2014 12:49 PM IST
आलोक पुतुल और आभा शर्मा/बीबीसी हिंदी
विज्ञापन
विज्ञापन
रोजी-रोटी के कुछ जरिए, कुछ काम-धंधे तेजी से बदलते समय के साथ दम तोड़ रहे हैं। इसके साथ ही उन लोगों की आजीविका ख़तरे में पड़ गई है जो इन पारम्परिक पेशों से जुड़े हुए हैं। आइए एक नज़र डालते हैं कुछ ऐसे ही पेशों पर।
विज्ञापन


छोटे शहरों और कस्बों में गली-गली घूमकर रंग-बिरंगी चूड़ियां पहनाने वाली महिलाएं चुड़िहारिन कहलाती थीं। किसी जमाने में हर चुड़िहारिन के हिस्से कोई गांव या मोहल्ला होता था।

वो या उसके परिवार का ही कोई सदस्य गांवभर में घूमकर चूड़ियां पहनाकर जाता था। उन्हें बदले में पैसा या अनाज मिलता था। लेकिन चुड़िहारिनें अब कहीं-कहीं मेले-ठेले या छोटे हाट-बाजार में ही नजर आती हैं, अंतिम पीढ़ी की तरह।
विज्ञापन


रमेश सिप्पी की सुपरहिट फ़िल्म 'शोले' में बसंती का तांगा आपको याद होगा। ज्यादा पुरानी बात नहीं है जब कस्बों और शहरों में तांगा यातायात का सस्ता और सुलभ साधन हुआ करता था।

लेकिन अब ऑटो ने तांगे की जगह ले ली है। यही वजह है कि जहां तांगों की भरमार होती थी, वहां अब मुश्किल से ही तांगे नजर आते हैं। यानी एक पेशा पूरी तरह से ख़त्म होने की कगार पर पहुंच गया है।
विज्ञापन

इनकी भी रोजी रोटी खतरे में है

शाही-ब्याह या किसी और तरह का आयोजन हो, गांव-देहातों में यहां तक की शहरों में भी खाने-पाने के लिए दोना-पत्तल का इस्तेमाल आम होता था।

लेकिन अब बाज़ार में उनकी जगह नई किस्म के मशीन से बनने वाले कागज़, थर्मोकोल और प्लास्टिक के सफेद-चमकीले दोने-पत्तलों ने ले ली है।

यही वजह है कि हरे पत्तल-दोने अब कम ही नज़र आते हैं और इसी के साथ उन लोगों की रोज़ी-रोटी भी ख़तरे में पड़ गई है जो इन्हें बनाते थे।

लोढ़ी-सिलौटी

पत्थर से मसाले पीसने के लिए लोढ़ी-सिलौटी पहले घर-घर में पाए जाते थे। देश के हर कोने में कुछ ख़ास जातियां दशकों से इस पेशे में लगी हैं।

पटना में कानू जाति के लोग के लोग इसी हुनर के ज़रिए अपना पेट पालते आए हैं। ऐसे ही एक परिवार के 40 साल के गणेश कंजर बताते हैं कि मिक्सी के बढ़ते चलन के कारण पिछले एक दशक से उनका कारोबार काफी कम गया है।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें