रोजी-रोटी के कुछ जरिए, कुछ काम-धंधे तेजी से बदलते समय के साथ दम तोड़ रहे हैं। इसके साथ ही उन लोगों की आजीविका ख़तरे में पड़ गई है जो इन पारम्परिक पेशों से जुड़े हुए हैं। आइए एक नज़र डालते हैं कुछ ऐसे ही पेशों पर।
छोटे शहरों और कस्बों में गली-गली घूमकर रंग-बिरंगी चूड़ियां पहनाने वाली महिलाएं चुड़िहारिन कहलाती थीं। किसी जमाने में हर चुड़िहारिन के हिस्से कोई गांव या मोहल्ला होता था।
वो या उसके परिवार का ही कोई सदस्य गांवभर में घूमकर चूड़ियां पहनाकर जाता था। उन्हें बदले में पैसा या अनाज मिलता था। लेकिन चुड़िहारिनें अब कहीं-कहीं मेले-ठेले या छोटे हाट-बाजार में ही नजर आती हैं, अंतिम पीढ़ी की तरह।
रमेश सिप्पी की सुपरहिट फ़िल्म 'शोले' में बसंती का तांगा आपको याद होगा। ज्यादा पुरानी बात नहीं है जब कस्बों और शहरों में तांगा यातायात का सस्ता और सुलभ साधन हुआ करता था।
लेकिन अब ऑटो ने तांगे की जगह ले ली है। यही वजह है कि जहां तांगों की भरमार होती थी, वहां अब मुश्किल से ही तांगे नजर आते हैं। यानी एक पेशा पूरी तरह से ख़त्म होने की कगार पर पहुंच गया है।