केदारनाथ त्रासदी में जिन जवानों ने सबसे पहले बचाने के लिए हाथ बढ़ाए थे, जिंदगी उनका ही साथ छोड़ कर चली गई।
मंगलवार को हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मारे गए 20 में से 15 आईटीबीपी के वो जवान थे, जिन्होंने सबसे पहले केदारनाथ पहुंचने की जिम्मेदारी ली थी।
संचार व्यवस्था और हेलीपैड कायम करने से लेकर आने वाले राहत दल का रास्ता साफ करने वाले यह जवान नौ दिनों तक वहीं डटे रहे।
करीब 20 हजार लोगों की जान बचाने वाले इन जांबाजों को नहीं मालूम था कि यह उनकी जिंदगी का आखिरी मिशन साबित होगा।
हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मारे गए सभी 20 शव मिले
मंगलवार को क्रैश हुए वायुसेना के हेलीकॉप्टर में सवार सभी 20 जवानों के शव बरामद कर लिए गए हैं। हालांकि शव बुरी तरह झुलस गए हैं, जिस कारण उनकी पहचान करने में मुश्किल हो रही है।
इस बीच वायुसेना प्रमुख एनएके ब्राउन ने अपने सैनिकों की हौसला आफजाई की। उन्होंने कहा कि मैं आप सभी के चेहरों पर मुस्कान देखना चाहता हूं। हमें आगे बढ़ते रहना होगा क्योंकि मिशन अभी पूरा नहीं हुआ है।
एमआई-17वी5 हेलीकॉप्टर का कॉकपिट वायस रिकॉर्डर और फ्लाइट डाटा रिकॉर्डर भी बरामद हुआ है, जिससे दुर्घटना के कारणों को जानने में मदद मिल सकती है।
हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मारे गए शहीदों की सूची (आईटीबीपी)
1. सब इंस्पेक्टर जयेंद्र प्रसाद, सामापट्टी, पौड़ी गढ़वाल
2. कांस्टेबल जोमोन पी जी, एलेपी, केरल
3. कांस्टेबल नंद राम, हंसकोटी,मिंग, चमोली
4. कांस्टेबल विभूति रॉय, धुबड़ी, असम
5. कांस्टेबल सर्वेश कुमार, हैबतपुरा, झांसी
6. कांस्टेबल अजय लाल, गोपेश्वर, तिरपक, चमोली
एनडीआरएफ (आईटीबीपी के जवान एनडीआरएफ के डेपुटेशन पर)
1. कमांडेंट नित्या नंद गुप्ता, कानपुर
2. इंस्पेक्टर भीम सिंह, कठुआ, जम्मू-कश्मीर
3. सब इंस्पेक्टर सतीश कुमार, भिवानी, हरियाणा
4. कांस्टेबल के विनायगन, चित्तूर, आंध्र प्रदेश
5. कांस्टेबल बस्सावराज यारागत्ती, गडग, कर्नाटक
6. कांस्टेबल संतोष कुमार पासवान, कोडरमा, झारखंड
7. कांस्टेबल संजीव कुमार, बलिया, उत्तर प्रदेश
8. कांस्टेबल पवार शशिकांत रमेश, धुलिया, महाराष्ट्र
9. कांस्टेबल अहिर राव गणेश, जलगांव, महाराष्ट्र
वायुसेना
1. विंग कामांडर डारेल कास्टेलीनो
2. फ्लाइट लेफ्टिनेंट प्रवीर
3. फ्लाइट लेफ्टिनेंट पी कपूर
4. जूनियर वारंट ऑफिसर ए के सिंह
5. सार्जेंट सुधाकर
भारत तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के प्रवक्ता दीपक पांडे ने बताया कि मारे गए इन जवानों में छह आईटीबीपी की तरफ से गए थे और 9 आईटीबीपी के वह जवान थे, जो नेशनल डिजास्टर रिस्पांस फोर्स (एनडीआरएफ) में डेपुटेशन पर थे। यह उत्तराखंड की तबाही के बाद राहत के लिए पहुंचने वाला पहला दल था।
पांडे के मुताबिक नौ दिनों बाद असंभव सा लगने वाला काम सफलतापूर्वक पूरा कर वह वापस लौट रहे थे ताकि अपने परिवार से संपर्क कर सकें। लेकिन 20 हजार यात्रियों को घर का रास्ता दिखाने वाले इन जवानों के लिए ऊपर वाले ने कुछ और ही फैसला कर रखा था।
दरअसल यह आपदा प्रबंधन के अति उन्नत प्रशिक्षण पाए जवान थे, जिन्हें ओडिशा के तूफान में राहत व बचाव का अहम तजुर्बा था। पांडे ने कहा कि आपदा प्रबंधन सिर्फ प्रशिक्षण से नहीं बल्कि तजुर्बे से आता है। यही वजह है कि इन जवानों का मारा जाना सिर्फ आईटीबीपी की नहीं बल्कि पूरे देश की क्षति है।
आईटीबीपी के उच्च अधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि यहां दिल्ली में बैठे-बैठे कतई अंदाजा नहीं लगाया जा सकता कि जवानों ने केदारनाथ की किस विकट परिस्थिति को अपने काबू में किया था। उस दिन उन्होंने केदारनाथ पहुंचने की जिम्मेदारी नहीं ली होती तो वहां से बचाए गए करीब 20 हजार यात्रियों में ज्यादातर मारे जा चुके होते।
अधिकारी के मुताबिक जवानों में इस बात का रोष है कि सरकार की तरफ से उनके लिए शहीद की घोषणा और इनाम तो दूर की बात, सहानुभूति और शाबासी का कोई औपचारिक बयान भी नहीं आया।