सुप्रीम कोर्ट किशोर न्याय कानून (जेजे एक्ट) में नाबालिग को परिभाषित करने वाले प्रावधान की संवैधानिकता की समीक्षा करेगा। जेजे एक्ट के तहत 18 वर्ष की आयु तक के व्यक्ति को नाबालिग माना गया है।
मालूम हो कि दिल्ली गैंगरेप में एक नाबालिग के शामिल होने की बात सामने आने के बाद से नाबालिग की उम्र को लेकर बहस छिड़ी है। पुलिस के मुताबिक 17 साल छह महीने उम्र के इस आरोपी ने ही चलती बस में युवती के साथ सबसे ज्यादा दरिंदगी की थी। लेकिन उसे जेजे एक्ट के प्रावधानों का लाभ मिलेगा।
सोमवार को जस्टिस केएस राधाकृष्णन की अध्यक्षता वाली पीठ ने किशोर न्याय (बच्चे की देखभाल एवं संरक्षण) अधिनियम में नाबालिग की परिभाषा निरस्त करने की जनहित याचिका पर विचार करने का निर्णय लिया। पीठ ने अटॉर्नी जनरल गुलाम वाहनवती से इस मामले में अदालत की मदद करने का अनुरोध किया और संबंधित दस्तावेज तथा जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। याचिकाकर्ता अधिवक्ता सुकुमार और कमल कुमार पांडे ने दलील दी कि जेजे एक्ट की धारा 2(एल), 10 और 17 तर्कहीन हैं और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के प्रावधानों के खिलाफ हैं।
अधिवक्ताओं ने कहा कि इस कानून में नाबालिग की परिभाषा संविधान के प्रतिकूल है, जबकि आईपीसी की धारा 82 और 83 में नाबालिग की परिभाषा में ज्यादा बेहतर वर्गीकरण है। इसमें सात साल से कम उम्र के बच्चे के कृत्य को किसी भी सूरत में अपराध नहीं माना गया है, जबकि 7 से 12 साल की उम्र तक के बच्चे के कृत्य को अपराध मानना या न मानना जज के विवेक पर छोड़ा गया है कि वह अपराध के स्तर और बच्चे की परिपक्वता के आधार पर तय करे।
सर्वोच्च अदालत ने इस याचिका पर 3 अप्रैल को अगली सुनवाई तय की है। पीठ ने कहा कि अदालत इस मसले पर विचार करेगी। यह मसला आयु निर्धारण से संबंधित है और यह कानून से जुड़ा सवाल है। मालूम हो कि शीर्ष अदालत में इस मसले पर कई याचिकाएं दायर हुई हैं और उन सभी में केंद्र सरकार और उसके मंत्रालयों से जवाब तलब किया जा चुका है। पीठ इन सभी याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करेगी।
क्या कहती है याचिका
जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की धारा 2(एल), 10 और धारा 17 को गैर संवैधानिक करार देते हुए कहा गया है कि यह अधिनियम अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करती हैं। संविधान विरोधी होने के आधार पर जेजे एक्ट में नाबालिग की परिभाषा को निरस्त करने की मांग सुप्रीम कोर्ट से की गई है।
याचिका के मुताबिक जेजे एक्ट में नाबालिग की उम्र सीमा 18 तय की गई है, जो सही नहीं है। जबकि भारतीय दंड संहिता में 7 से 12 साल तक के बच्चों के अपराध की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए जज को सजा देने का अधिकार दिया गया है जो अधिनियम की वजह से प्रभावी नहीं है। ऐसे में यह अधिनियम लोगों के मौलिक अधिकारों को प्रभावित करता है जोकि असंवैधानिक है।
क्या है धारा 82 और 83
याचिकाकर्ता के मुताबिक आईपीसी की धारा 82 के तहत सात साल की उम्र तक के बच्चे द्वारा किया गया कोई भी कृत्य अपराध नहीं है। वहीं, धारा 83 के तहत 7 से 12 साल तक के बच्चे के कृत्य को अपराध मानना या न मानना जज के विवेक पर छोड़ा गया है कि वह अपराध और बच्चे की परिपक्वता के आधार पर यह तय करे। वह देखे कि बच्चा इतना परिपक्व है या नहीं कि वह समझ सके कि उसके कृत्य के क्या परिणाम होंगे।
नाबालिग की उम्र जटिल मामला: चिदंबरम
वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने कहा कि दांपत्य जीवन में होने वाले बलात्कार, नाबालिग की उम्र सीमा और सैन्य बल विशेषाधिकार कानून से जुड़ी सिफारिशें जटिल मामले हैं। इन मुद्दों पर गहन विचार विमर्श के बाद ही कोई फैसला किया जाएगा। चिदंबरम ने यह सफाई भी दी कि नाबालिगों के अपराध को बाल अपराध कानून के तहत देखा जाता है। सरकार को यह फैसला करना है कि उसकी उम्र की सीमा को कम किया जाए या नहीं। यह भी ऐसा जटिल मसला है जिस पर आम सहमति नहीं बन पा रही है।
दूसरी बार दुष्कर्म में भी मृत्युदंड संभव
चिदंबरम ने कहा कि अध्यादेश में बलात्कार के कारण हुई मौत पर फांसी की सजा तय की गई है। इसके अलावा महिला के घटना की वजह से लंबे वक्त के लिए कोमा में चले जाने की सूरत में भी फांसी दी जा सकती है। यदि कोई बलात्कारी दूसरी बार भी दुष्कर्म के मामले में दोषी ठहराया जाता है, तब भी उसे मृत्युदंड दिया जा सकता है।