सरबजीत के लिए न दुआ काम आई और न दवा। लाहौर के जिन्ना अस्पताल में आखिरकार सरबजीत सिंह जिंदगी की जंग हार गया।
डॉक्टर उसे ब्रेन डेड घोषित कर चुके थे। इसके बावजूद डॉक्टर उसे बचाने की कोशिश में लगे थे। आखिर कैसे रहे सरबजीत के पिछले छह दिन।
26 अप्रैल 2013- लाहौर की कोट लखपत जेल में बंद सरबजीत सिंह पर पाकिस्तानी कैदियों ने धारदार हथियार और ईंटों से हमला किया। हमले में सरबजीत के सिर पर गहरी चोट आई। सरबजीत को जिन्ना अस्पताल के आईसीयू में भर्ती कराया गया।
27 अप्रैल 2013 - कातिलाना हमले के बाद सरबजीत गंभीर बेहोशी की हालत में चला गया। पाकिस्तान सरकार ने सरबजीत के परिवार के चार सदस्य उसकी पत्नी, बहन और उनकी दोनों बेटियों को वीजा दिया।
28 अप्रैल 2013 - सरबजीत के परिजन पाकिस्तान पहुंचे। लाहौर के जिन्ना अस्पताल के प्रबंधकों ने परिवार को सरबजीत से मिलने की इजाजत दी। हालांकि परिजनों को केवल आईसीयू की खिड़की से ही देखने दिया गया।
29 अप्रैल 2013 - सरबजीत को इलाज के लिए विदेश भेजने से पाकिस्तान ने इंकार किया। वहीं भारत ने पाकिस्तान से सरबजीत को मानवीयता के आधार पर रिहा करने और उस पर हमला करने वालों को दंडित करने की मांग की।
30 अप्रैल 2013 - सरबजीत सिंह की हालत पहले से ज्यादा बिगड़ी। पाकिस्तानी डॉक्टरों ने सरबजीत को ‘ब्रेन डेड’ माना। इस बीच सरबजीत का परिवार भारतीय डॉक्टरों को बुलाने की मांग करता रहा।
1 मई 2013 - सरबजीत के परिजन भारत लौटे। देर रात लाहौर के जिन्ना अस्पताल में सरबजीत सिंह की मौत हो गई।
क्या था मामला
49 वर्षीय सरबजीत को 1990 में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में हुए बम धमाके में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। इस धमाके में 14 लोगों की जान गई थी।
गिरफ्तारी के बाद सरबजीत को फांसी की सजा सुनाई गई थी। बाद में सरबजीत ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति के पास दया याचिका दायर की थी, जिसे तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने खारिज कर दिया था।
हालांकि 2008 में पाकिस्तान में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की सरकार आने पर राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के हस्तक्षेप के चलते फांसी की सजा टल गई थी। सरबजीत का परिवार और भारत इस मामले को गलत पहचान का मामला बताता है।