आम आदमी पार्टी के लड़खड़ाते कदम जीत का हैंगओवर हैं या सत्ता का सुरूर?
महीने भर पहले ऐतिहासिक जीत दर्ज कर सत्ता में आई आप को एकाएक राष्ट्रीय दलों का विकल्प मान लिया गया। पार्टी के एजेंडे, नीतियों और संविधान को लेकर सवाल उठ रहे थे, लेकिन जीत का शोर इतना तेज था कि सभी सवाल दब गए।
योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण के प्रकरण ने उन सवालों को तरोताजा कर दिया है। आम आदमी पार्टी के आतंरिक लोकपाल एडमिरल रामदास के पत्र और बीते सप्ताह हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद माना जा रहा है कि पार्टी की सर्वोच्च इकाई राजनीतिक मामलों की समिति (पीएसी) से योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को बाहर किया जा सकता है।
हालांकि योगेंद्र यादव का कहना है कि उन्हें और प्रशांत को लेकर की आ रही खबरें मनगढ़ंत हैं, जबकि आप नेता संजय सिंह ने कहा है कि अरविंद केजरीवाल को संयोजक पद से हटाने के लिए साजिश की जा रही है।
आरोप, प्रत्यारोप और चिटिठयों ने ये तो स्पष्ट कर दिया है कि आम आदमी पार्टी दो खेमें में बंट चुकी हैं। आप नेता आशुतोष ने इसे विचारधाराओं का संघर्ष करार दिया है। फिलहाल ये भविष्य को तय करने दें कि आप की आंतरिक कलह विचारधारा का संघर्ष है या व्यक्तिगत महात्वाकांक्षाओं की उठापटक?
सबसे जरूरी सवाल यह है कि भाजपा और कांग्रेस जैसे दलों की आलोचना कर राजनीति में आई आप उन्हीं की दिशा में क्यों बढ़ चली है? आम आदमी पार्टी के भीतर से पिछले कुछ दिनों से जैसी आवाजें आ रही हैं, उनसे आभास हो रहा है कि पार्टी के भीतर कांग्रेस और भाजपा की तर्ज का अलाकमान कल्चर पनप रहा है।
उस अलाकमान का केंद्र आप संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के इर्दगिर्द है। पार्टी के फैसले आम सहमति के बजाय अरविंद केजरीवाल की समझ से लिए जा रहे हैं। और ये प्रवृत्ति ही योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे नेताओं की नाराजगी का कारण बताईं जा रही हैं।
दिल्ली से बाहर अन्य राज्यों में चुनाव लड़ने का मसला पार्टी के भीतर विवाद की सबसे बड़ी वजह बन गया है।
पिछले महीने रामलीला मैदान में शपथग्रहण के बाद अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि उनकी पार्टी अगले पांच साल तक दिल्ली में ही काम करेगी, किसी अन्य राज्य में चुनाव नहीं लड़ेगी, जबकि योगेंद्र यादव अन्य राज्यों में चुनाव लड़ने के पक्षधर हैं।
ऐसा भी नहीं की पार्टी के भीतर योगेंद्र की ही ऐसी राय है। मयंक गांधी और एचएस फुल्का जैसे आप नेता भी अन्य राज्यों में चुनाव लड़ने की वकालत कर चुके हैं। आप ने हाल ही पंजाब में हुए निकायों चुनावों में प्रचार भी किया था, जबकि उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा था।
अरविंद केजरीवाल के मनाही के बाद भी योगेंद्र यादव ने हरियाणा और पंजाब में राजनीतिक बैठकें कीं। हरियाणा की भाजपा सरकार के खिलाफ उन्होंने 'नमक का कर्ज' नाम से राजनीतिक आंदोलन चलाने का प्रयास भी किया।
अन्य राज्यों में चुनाव न लड़ने के पीछे अरविंद केजरीवाल लोकसभा चुनावों की विफलता को कारण मानते हैं। उनका कहना है कि पीएसी की राय थी कि देश भर में लोकसभा चुनाव लड़ा जाए, जबकि वह उसके समर्थन में नहीं थे। उन्होंने पीएसी की भीतर बहुमत की राय के आगे झुकते हुए चुनाव लड़ने का फैसला किया।
अरविंद का कहना है कि लोकसभा चुनावों में हार के बाद पीएसी के राय के बाद भी उन्होंने दिल्ली को छोड़ कर किसी भी अन्य राज्य में चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया।
दिल्ली विधानसभा चुनावों से पहले एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि पीएसी मे बहुमत की राय थी कि हरियाणा में विधानसभा चुनाव लड़ा जाए, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया। पीएसी को उनके फैसले के आगे झुकना पड़ा।
योगेंद्र यादव का कहना है कि लोकसभा चुनाव लड़ने के कारण ही आम आदमी पार्टी जिला स्तर पर संगठन तैयार कर पाई। रोचक पहलू ये भी है कि आम आदमी पार्टी की पीएसी की बैठक लंबे समय से हुई ही नहीं। दरअसल आप की पीएसी का पुनर्गठन किया जाना हैं और ये लगातार टल रहा है।
दिल्ली चुनावों के बाद पिछले हफ्ते इसकी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई और बैठक में पीएसी के गठन का जिम्मा अरविंद केजरीवाल को सौंप दिया गया। संविधान के मुद्दे पर भी आम आदमी पार्टी में चुप्पी बनी हुई है। अब तक पार्टी का संविधान सामने नहीं आया है।
पार्टी सूत्रों का कहना है कि संविधान का ड्राफ्ट पिछले वर्ष ही तैयार कर लिया गया था, लेकिन इसे अब तक स्वीकार नहीं किया गया।
दिल्ली चुनावों में टिकट बंटवारा भी आम आदमी पार्टी में कलह का कारण बना था। माना जाता है कि अरविंद केजरीवाल ने कई ऐसे व्यक्तियों को टिकट दिया था, जिन्हें टिकट दिए जाने के पक्ष में प्रशांत भूषण नहीं थे। पार्टी से प्रशांत के अलगाव का कारण यही मुद्दा बना।
बहरहाल राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मौजूदा संकट आम आदमी पार्टी के लिए परीक्षा की घड़ी है। इस परीक्षा को पास करने का तरीका ही पार्टी की दशा और दिशा तय करेगा।