जिस तरह बीते सोमवार को भारतीय जनता पार्टी के नेताओं में आईपीएल के पूर्व कमिश्नर ललित मोदी के पक्ष में सहानुभूति पैदा करने के लिए होड़ मची, उससे वो ज़रूर ही खुश हुए होंगे।
ललित मोदी पिछले पांच सालों से देश से बाहर हैं। सत्ताधारी दल ने इस बात ज़ोर दिया है कि ललित मोदी को ट्रैवल डाक्यूमेंट दिलाने में विदेश मंत्री को जो हद से आगे बढ़कर कोशिश करनी पड़ी उसका पूरा और एकमात्र कारण मानवीय आधार है। उनका पक्ष समझ में आता है।
जब प्रधानमंत्री ने तूफ़ान को बढ़ते देखा तो उनकी प्राथमिकता बनती थी किसी क़ीमत पर इन आरोपों से सरकार को अलग करना। आख़िर अभी एक सप्ताह पहले ही उन्होंने ट्रिब्यून के साथ एक साक्षात्कार में कहा था कि जनता के लिए अच्छे दिन तभी आएंगे जब पुराने दिनों के याराना भ्रष्टाचार का अंत होगा।
तो फिर, कैबिनेट की सबसे वरिष्ठ सदस्यों में से एक के प्रवर्तन निदेशालय के एक 'भगोड़े' की मदद करने पर वो कैसे चुप रह सके?
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असल में सुषमा स्वराज को अपने दम पर बचाव करने देने का मतलब होता अपने ही आभामंडल को बिगाड़ना और मोदी ऐसा कभी नहीं होने देना चाहेंगे, हालांकि सुषमा से उनके बहुत अच्छे रिश्ते नहीं हैं। हालांकि इस रणनीति की समस्या यह है कि यह पार्टी को बहुत ही फ़िसलन भरे ट्रैक पर डाल देती है।
यानी अगर नरेंद्र मोदी का बचाव करने का मतलब सुषमा स्वराज का बचाव करना है तो इसके बदले भाजपा को ललित मोदी का भी बचाव करने की ज़रूरत होगी। इसमें निहित यह नैतिक गिरावट स्वाभाविक है। लेकिन इसमें एक राजनीतिक नुकसान भी है और लगता है कि जिसका प्रधानमंत्री ने आकलन नहीं किया है।
भाजपा को, किसी भी क़ीमत पर, सोमवार को एक लिखी हुई पटकथा पर चलना था। ललित मोदी की पारिवारिक परेशानियों की बात की गई, जिस आर्थिक अपराध के लिए उनकी जांच हो रही है उसे हल्का बनाने की कोशिश की गई और स्वराज की भूमिका को मामूली क़रार दिया गया।