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इनके जीवन में पानी भी बन सकता है 'विलेन'

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पिछले कई सालों में भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में पानी की वजह से लोगों का विस्थापन बड़े पैमाने पर हो रहा है। तकरीबन आधा पूर्वोत्तर भारत इस समस्या से जूझ रहा है। एक ओर सिक्किम में पनबिजली घरों और उन पर बने बांधों की वजह से लेप्चा जनजाति के अस्तित्व पर ही खतरा मंडरा रहा है। तो दूसरी ओर, असम में ब्रह्मपुत्र नदी के चौड़े हो रहे पाटों से लाखों लोग बेघर होते जा रहे हैं।
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ज्ञान ओंगरब लेप्चा और उनकी पत्नी कर्मा लेप्चा के दिन की शुरुआत नदी की प्रार्थना से होती है। 50 वर्षीय ज्ञान सिक्किम के जोंगू जिले के एक अमीर किसान हैं, जिनकी कई पुश्तें यहीं पली-बढ़ीं हैं। तीस्ता नदी के किनारे बने अपने आलीशान बंगले में रहने वाले इस लेप्चा दंपती को अब डर लगने लगा है।

उन्होंने कहा, "जिस दिन से हमारे घर से थोड़ी दूर एक बाँध बना और उसमे जमा होने वाला पानी बढ़ने लगा, हमारी मुश्किलें शुरू हुईं। नदी हमारी जमीन को निगलती जा रही है और फर्श में दरारें पड़नी शुरू हो गई हैं। मुझे नहीं लगता हम कुछ साल से ज्यादा यहाँ रह सकेंगे। बदकिस्मती या फिर किस्मत से ही सही, मेरे पिता आज ये दिन देखने के लिए जीवित नहीं हैं।"
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लेप्चा जनजाति पर खतरा

लेप्चा जनजाति के लोग सिक्किम के मूल निवासी हैं। ये लोग मुख्य रूप से चीन की सीमा से सटे जोंगू में रहते हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इनकी आबादी लगभग 40,000 है। लेकिन भारत के सैकड़ों नए बांधों में से कुछ सिक्किम में भी बन रहे हैं। इस वजह से लेप्चा लोगों को अपनी जमीन या घर छोड़ना पड़ सकता है। वैसे तो बांध बनने से बिजली उत्पादन बढ़ा है, लेकिन स्थानीय लोगों को अब अपने घरों से दूर किए जाने का खौफ सता रहा है।

ज्ञान लेप्चा की तरह ऐसे कई लोग हैं, जो नदी के पास के घरों को छोड़ ऊपर पहाड़ों की तरफ जाने को मजबूर हैं। जोंगू से सैकड़ों मील दूर असम में लाखों ऐसे लोग भी हैं, जो पानी की वजह से विस्थापित हो चुके हैं। कुछ वर्ष पहले तक, छह बच्चों के पिता मुशीबुर शेख, बीस बीघा जमीन के मालिक थे। जब नदी इनके घर और जमीन को निगलने पर आई, वे जान बचा कर भागे। अब मजदूरी करके पेट पालना एकमात्र रास्ता बचा है।

मुशीबुर ने बताया, "हम बहुत संपन्न थे, पर अब नहीं। जब यहाँ पहुंचे तो सिर पर छत नहीं थी, लेकिन इन शरणार्थी शिविरों में रहने के सिवा कोई दूसरा चारा भी तो नहीं है। मेरी जमीन हमेशा के लिए चली गई।" मुशीबुर की तरह हजारों ऐसे लोग हैं, जिनकी जमीन ब्रह्मपुत्र नदी के बहाव बदलने और पाटों की चौड़ाई बढ़ जाने से पानी में समा चुकी है।

रह्मपुत्र का कहर

पिछले कई दशकों में विशालकाय ब्रह्मपुत्र नदी ने अपनी दिशा कई दफा बदली है। इस प्रक्रिया में करीब दो हजार वर्ग मील की उपजाऊ जमीन नदी में समा चुकी है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, सिर्फ असम में ही हर साल तकरीबन 250 गाँव नदी में समा जाते हैं। आंकड़े बताते हैं कि 1950 के दशक में जहाँ इस नदी की औसत चौड़ाई लगभग एक किलोमीटर थी, वो अब बढ़कर औसतन पांच किलोमीटर हो चुकी है।

राज्य के धुबरी, बोरपाड़ा, बोंगाईगांव और कामरूप जिलों में विस्थापितों की संख्या बीस हजार से ज्यादा हो चुकी है। केंद्र सरकार से लेकर कई राज्य सरकारों ने पूर्वोत्तर में विस्थापितों के लिए कई योजनाएं शुरू कीं, लेकिन बढ़ती तादाद को देखते ये कमजोर पड़ रहीं है। सिक्किम सरकार ने विस्थापन के भय में जी रहे लेप्चा लोगों को आश्वासन दिया है कि जोंगू जिले में ही उनके पुनर्स्थापन पर काम होगा।
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कैसे निपटा जाए?

उधर असम सरकार में बचाव और पुनर्स्थापन का जिम्मा संभालने वाले प्रमुख सचिव पीएल तिवारी ने भी बीबीसी को बताया कि सरकार जी-जान से काम कर रही है। उन्होंने कहा, "जमीन का कटाव सबसे बड़ी समस्या है। दूसरी विकराल समस्या है वनों की कटाई। अगर ऐसे ही हालात रहे तो समस्या बहुत भयावह रूप ले लेगी।

अब मामले को केंद्र सरकार तक पहुंचाया जा रहा है, क्योंकि सिर्फ थोड़े-बहुत पुनर्स्थापन से काम नहीं चलने वाला।" पूर्वोत्तर भारत की गिनती सबसे खूबसूरत इलाकों में होती है। लेकिन जनसंख्या और अत्यधिक विकास ही इस इलाके की चिंता नहीं हैं। उनसे बड़ा मुद्दा यह है पर्यावरण में आते बदलाव की वजह से यहां के मूल निवासियो के अस्तित्व पर ही खतरा मंडरा रहा है।
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