फरवरी 1938 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कहा था कि स्वतंत्र भारत की सरकार को सबसे पहले देश में मौजूद विकराल गरीबी से निपटने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर योजना बनाने के लिए एक आयोग बनाना होगा।
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उस वक्त उन्होंने कांग्रेस की एक शाखा के तौर पर राष्ट्रीय नियोजन समिति बनाई, जिसके अध्यक्ष नियुक्त किए गए थे, पंडित जवाहरलाल नेहरू, जो कि बाद में स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री, और मार्च 1950 को गठित देश के पहले योजना आयोग के अध्यक्ष भी बने।
उन्होंने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट आइजनहॉवर को एक पत्र के जरिये देश में नियोजन प्रक्रिया के संबंध में सुझाव देने के लिए किसी अर्थशास्त्री को भेजने की प्रार्थना की थी। जवाब में जब विख्यात अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन को भारत भेजा गया, तो नेहरू ने दुबारा अमेरिका को पत्र लिखा, जिसमें ऐसे व्यक्ति को भेजने पर नाराजगी जताई गई थी, जिसे नियोजन की अवधारणा पर ही भरोसा नहीं था।
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दरअसल स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ही देश में इस बात पर सहमति बन गई थी कि आजाद भारत की सरकार के सरोकार ब्रिटिश सरकार से अलग होंगे, और गरीबी उन्मूलन और सामाजिक- आर्थिक पुनर्वितरण की जिम्मेदारी मुख्यतः सरकार की ही होगी।
आज के दौर में योजना आयोग की प्रासंगिकता
64 वर्ष पहले जब योजना आयोग बना था, तब से आज समय काफी बदल गया है। तब राष्ट्र निर्माण की विकराल चुनौती को देखते हुए, संसाधनों का नियोजित उपयोग जरूरी था। पर आज हमारी अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शुमार की जाती है।
तब योजना आयोग सार्वजनिक क्षेत्र का वह उपकरण माना गया था, जो अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयां देने के लिए जरूरी था। मगर 1991 के बाद पूरी दुनिया के साथ भारत की नीति में भी बदलाव आए। लाइसेंस राज का अंत हो गया। और देश की अर्थव्यवस्था ने विकास के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के बजाय निजी क्षेत्र की ओर देखना शुरू किया।
स्वतंत्रता दिवस को दिए गए अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने योजना आयोग की जगह एक ऐसे नए संस्थान के गठन की घोषणा की, जो रचनात्मक सोच, सार्वजनिक-निजी भागेदारी, संसाधनों, खासकर युवाओं के अधिकतम उपयोग पर होगा। मगर प्रधानमंत्री की इस घोषणा से कई सवाल खड़े होते हैं।
योजना आयोग की जगह कौन लेगा
पहला सवाल तो यह है कि फिलहाल चल रही बारहवीं पंचवर्षीय योजना का क्या होगा, जिसे न सिर्फ केंद्र सरकार ने बल्कि राष्ट्रीय विकास परिषद ने भी स्वीकारा था, जिसमें गुजरात भी शामिल था। दूसरा, ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि राज्यों में विकास व्ययों के लिए योजनागत आवंटन करने की भूमिका केंद्रीय वित्त मंत्रालय को सौंपी जाएगी।
देवेगौडा सरकार में योजना मंत्री रहे वाई के अलघ मानते हैं कि जिन राज्यों में दूसरे दलों की सरकार है, क्या वह इसके लिए तैयार होंगे। राज्यों और योजना आयोग के बीच मतभेद भले रहे हों, मगर अलघ के मुताबिक पिछले साठ वर्षों में ऐसा एक भी मामला नहीं आया है, जबकि किसी राज्य ने योजना आयोग द्वारा किए गए वार्षिक आवंटन को खारिज किया हो।
सवाल यह भी है कि केंद्रीय मंत्रालयों और केंद्र व राज्यों के बीच संसाधनों के आवंटन का काम अगर योजना आयोग से ले लिया गया, तो फिर ये किसे सौंपे जाएंगे। राष्ट्रीय विकास परिष्ाद और अंतरराज्यीय परिष्ाद के अलावा योजना आयोग के विकल्प के तौर पर एक ऐसे संस्थान की जरूरत होगी केंद्र और राज्य सरकारों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा सके।
वित्त मंत्रालय में घाटे को कम करने के लिए योजनागत व्यय को कम करने की प्रवृत्ति होती है, ऐसे में, कोई ऐसा संस्थान जरूर होना चाहिए, जो राज्य सरकारों और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े मंत्रालयों की आवाज बन सके।
फिर राज्यों में जो योजनाएं चल रही हैं, उन पर पर्यवेक्षण करने का काम कौन करेगा। अगर यह जिम्मेदारी केंद्रीय मंत्रालय उठाएंगे, तो क्या यह राज्य सरकारों, खासकर जहां विरोधी दलों की सरकार है, को स्वीकार्य होगा।
योजना आयोग की शोधकारी भूमिका भी है। अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों की पूरी जानकारी योजना आयोग अपने पास रखता है, और इस शोधपरक जानकारियों का उपयोग सभी मंत्रालय करते हैं। योजना आयोग के खत्म होने पर यह जिम्मेदारी किसके सुपुर्द की जाएगी। इन सवालों का उचित जवाब ढूंढे बगैर, योजना आयोग को खत्म कर देना, नाहक अनिश्चितता की वजह बन सकता है।