रोहनिया उपचुनाव में भाजपा ने सीधी दावेदारी नहीं की है। बावजूद इसके यह चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रतिष्ठा से जुड़ गया है।
यही वजह है कि भाजपा ने अपने सहयोगी अपना दल की उम्मीदवार कृष्णा पटेल की जीत के लिए पूरी ताकत झोंक दी है।
पार्टी के पारंपरिक वोटों को अपना दल प्रत्याशी के पक्ष में सहेजने की जिम्मेदारी रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा को दी गई है, क्योंकि इस इलाके में कुर्मी वोटों के बाद सबसे ज्यादा भूमिहार मतदाता हैं।
नरेंद्र मोदी की जीत के बाद उनके संसदीय क्षेत्र में पहला चुनाव रोहनिया विधानसभा क्षेत्र में हो रहा है। भाजपा के सहयोग से मिर्जापुर से अनुप्रिया पटेल के संसद में पहुंचने से खाली हुई इस सीट पर लड़ाई नाक का सवाल बन गई है।
उपचुनाव की तैयारी में बीजेपी
भाजपा ने यहां भले ही सीधे उम्मीदवार न खड़ा किया हो लेकिन उसकी सहयोगी पार्टी अपना दल तो मैदान में है ही।
वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव के लिए माहौल बना रही भाजपा के लिए हर कीमत पर अपना दल की इस सीट को बरकरार रखना जरूरी है क्योंकि यहां की हार-जीत का संदेश दूर तक जाएगा।
रोहनिया विधानसभा क्षेत्र में तीन लाख 64 हजार 519 वोटर हैं। इसमें 40 फीसदी मतदाता कुर्मी जाति के हैं जबकि प्रमुख राजनीतिक दलों ने इसी समाज के प्रत्याशियों को टिकट दिया है।
अपना दल की कृष्णा पटेल के अलावा सपा के टिकट पर ब्लाक प्रमुख महेंद्र सिंह पटेल, कांग्रेस की भावना पटेल और कौमी एकता दल के प्रत्याशी डा. शिवाजी कुर्मी जाति के ही हैं। जाहिर है कि ऐसे में कुर्मी वोटों का विभाजन भी होगा।
मैदान में हैं अपना दल उम्मीदवार
राजनीतिक हलके में चर्चा है कि कुर्मी मतों के बिखराव की आशंका के मद्देनजर क्षेत्र में संख्या बल में दूसरे स्थान पर आने वाले 18 फीसदी भूमिहार मतों को सहेजने की जिम्मेदारी भाजपा ने उठाई है और मनोज सिन्हा को प्रभारी बनाकर इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई है।
शुरुआत में भाजपा ने इस चुनाव से एक संयमित दूरी बना रखी थी लेकिन दिल्ली से निर्देश मिलने के बाद से कार्यकर्ता सक्रिय हो गए हैं और संघ का कैडर भी प्रचार में जुट गया है।
भाजपा नेताओं का कहना है कि उनकी पार्टी रोहनिया में पारंपरिक वोट बैंक सहेजने में जुटी है और अपना दल अपने वोट बैंक को। मोदी के संसदीय क्षेत्र में पहला चुनाव है।
ऐसे में प्रचार अभियान में भविष्य की योजनाओं के साथ-साथ केंद्र सरकार की उपलब्धियों को भी शामिल किया जाएगा। जापान के क्योटो शहर की तरह वाराणसी के विकास के लिए समझौते को भी जनता के बीच ले जाया जाएगा।