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गुजरात में आज भी हर ओर मोदी

Sun, 07 Sep 2014 11:51 AM IST
जुबैर अहमद/बीबीसी संवाददाता, अहमदाबाद
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात में 12 साल तक मुख्यमंत्री रहे। उनका दौर जितना विवादों के लिए जाना जाएगा उतना ही उनकी प्रभावशाली चुनावी सफलताओं के लिए भी।
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मोदी गांधीनगर से एक लंबी छलांग लगाकर दिल्ली के शाही सिंहासन पर बैठ गए हैं लेकिन 2002 के दंगों और फ़र्ज़ी एनकाउंटर हत्याओं के विवाद ने उनका साथ अब भी नहीं छोड़ा है।

इसलिए 100 दिन बाद भी न वो गुजरात को भूल पाए हैं और न गुजरात उन्हें भूल सका है।

सोहराबुद्दीन फर्जी एनकाउंटर मामले में सरकार के ख़िलाफ़ लड़ने वाले वकील शमशाद पठान कहते हैं, "चुनावी सफलताएं किसी को क़ानून के शिकंजे से आज़ाद नहीं कर सकतीं। फर्जी एनकाउंटर उनके काल में हुआ था और वह राज्य के मुख्यमंत्री थे तो जवाबदेही उनकी ही बनती है।"
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मगर गुजरात में उनका दबदबा कम नहीं हुआ है। वो आम लोगों के बीच एक दबंग नेता के रूप में अब भी देखे जाते हैं। हालांकि आलोचक उन्हें । गुजरात विकास मॉडल का क्रेडिट देने को अब भी तैयार नहीं।

जितने विवादास्पद हैं उतने ही लोकप्रिय भी

जागृति पांड्या अपने पति हरेन पांड्या की हत्या का केस लड़ रही हैं। वह कहती हैं मोदी की कमी महसूस नहीं की जा रही है।

"मैं पैदा यहां हुई, पली-बढ़ी यहां। मेरे बचपन में भी बिजली नहीं जाती थी। तब भी गुजरात का विकास हो रहा था। तो मेरे विचार में गुजरात का मुख्यमंत्री कोई दूसरा भी होता तो भी विकास होता।"

मोदी जितने विवादास्पद हैं उतने ही लोकप्रिय भी। उनको गुजरात छोड़े 100 दिन हो गए लेकिन राज्य में उनकी उपस्थिति साफ महसूस होती है।

वरिष्ठ पत्रकार अजय उमट मोदी के क़रीबी माने जाते हैं। वह कहते हैं, "उनकी कमी काफ़ी महसूस की जा रही है। गुजरात की हवाओं में उनकी कमी महसूस हो रही है।"

आम गुजराती, ख़ास तौर से युवा पीढ़ी उन्हें याद करती है लेकिन वह इससे संतुष्ट हैं या उन्हें गर्व है कि उनके नेता अब देश के प्रधानमंत्री बन गए हैं।

अहमदाबाद के एक निवासी ने कहा मोदी लोगों के दिल और दिमाग में बसे हैं।

गुजरात का विकास

शहरी ढांचों की बात करें तो सा नजर आता है कि गुजरात के कई शहरों में तरक्की हुई है। अहमदाबाद और गांधीनगर का मुक़ाबला भारत के किसी भी बड़े शहर से किया जा सकता है।

चौड़ी सड़कें, फ्लाईओवर, कांच की ऊंची इमारतें, मॉल और अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों के अति सुंदर दफ्तर-यहां सब कुछ है। देहातों पर भी ध्यान दिया गया है। गुजरात में कई 'मॉडल विलेज' बनाए गए हैं जिनमें से एक में मैं गया और यह देखकर हैरान हुआ कि एक छोटे से गांव में हर सुविधा मौजूद है।

इसके बावजूद मोदी की इस बात के लिए आलोचना हुई है कि मानव विकास सूचकांक में उनके प्रशासन का ध्यान आकर्षित नहीं हुआ।

सुनने में आया है कि नई मुख्यमंत्री आनंदीबेन मानव विकास सूचकांक पर अधिक ध्यान दे रही हैं। भाजपा के एक नेता ने कहा कि आनंदी बेन के लिए यही एक तरीक़ा है मोदी के लंबे साए से बाहर निकलने का और राज्य में अपनी छाप छोड़ने का।

नई मुख्यमंत्री की चुनौ‌ती

गुजरात की नई मुख्यमंत्री के लिए दिक्कत यह है कि मोदी की कद्दावर शख़्सियत हर जगह उनकी याद दिलाती है। गुजरात में मोदी की शारीरिक उपस्थिति भी आप महसूस कर सकते हैं।

सड़कों और गलियारों में जिधर देखो उधर बिलबोर्ड और पोस्टरों से मोदी का चेहरा दिखाई देता है। आनंदीबेन दफ्तर जाते समय या घर लौटते समय मोदी के इन चेहरों को नजरअंदाज नहीं कर सकतीं।

और तो और उनकी सरकार के मुख्य सूचना अधिकारी कोई और नहीं मोदी के अपने छोटे भाई हैं। कहा जाता है कि आनंदी बेन उन्हें पसंद नहीं करतीं लेकिन उन्हें वह हटा भी नहीं सकती।

हमने मुख्यमंत्री से बात करने की पूरी कोशिश की लेकिन नरेंद्र भाई के छोटे भाई की इच्छा के बग़ैर यह नामुमकिन था और मेरी वहां तक सुनवाई नहीं हो सकी।

'मोदी बातों के धनी'

नरेंद्र मोदी की पार्टी और सरकार के कुछ मंत्री अंदर ही अंदर खुश हैं। यह दावा है कांग्रेस के शक्ति सिंह गोहिल का जो नरेंद्र मोदी के काल में गुजरात विधानसभा में विपक्ष के नेता थे।

वह कहते हैं, "गुजरात में नरेंद्र भाई के जाने से अगर कोई सबसे अधिक खुश है तो वो हैं गुजरात सरकार के मंत्री। वो अब यह महसूस करते हैं कि वो आजाद हैं। मोदी जी के दिल्ली जाने का मतलब उनके अच्छे दिन आ गए।"

गोहिल से मोदी का गुजरात विधानसभा में दर्जनों बार सामना हुआ है। वो कहते हैं जल्द ही गुजरात के बाहर भी देश के लोग जान जाएंगे कि मोदी केवल 'बातों के धनी हैं'।

वह आगे कहते हैं, "चुनाव प्रचार के समय वह कहते थे कांग्रेस को हटा दो भाइयों और बहनों, मुझे बिठा दो। हर दर्द की दवा हूं मैं। और आने के बाद कहते हैं कड़वी दवाएं खाने के लिए तैयार रहो। कड़े कदम उठाने पड़ेंगे। तो यह कहते कुछ हैं, करते कुछ और हैं और होता कुछ और है।"

गुजरात में मोदी हों या न हों समाज में उनकी चर्चा होती ही रहती है। मैंने जब भी किसी से आनंदीबेन की सरकार के 100 दिन पूरे होने पर उनकी प्रतिक्रिया जाननी चाही लोगों ने घूम-फिरकर मोदी के बारे में ही बातें कीं।
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हर ओर मोदी

मजेदार बात ये है कि मैंने यह महसूस किया कि चाहे प्रशासन के लोग हों या भाजपा नेता वो इंटरव्यू रिकॉर्ड शुरू होने से पहले । मोदी की आलोचना और तारीफ दोनों करते हैं, लेकिन जैसे ही रिकॉर्डिंग मशीन शुरू होती है लोग अपने तेवर बदल देते हैं और उनकी प्रशंसा ही करना पसंद करते हैं।

मोदी के विरोधी वकील शमशाद पठान कहते हैं, "देखिए गुजरात में कोई भी इंसान जब काम करता है तो वह डर के साये में ही करता है। लेकिन लड़ाई अगर हक़ की हो तो डर के बावजूद काम तो करना ही पड़ता है।"

नरेंद्र मोदी के आलोचक अधिकतर बुद्धिजीवियों में हैं और वो खुद को एक अजीब स्थिति में पाते हैं। उन्होंने गुजरात में मोदी का खुलकर विरोध किया पर आज वो पूरे देश के प्रधानमंत्री हैं और भारी चुनावी सफलता के साथ।

अब उनकी दिक्कत यह है कि आम लोग उनकी बातें सुनने को तैयार नहीं। और जहां तक आम लोगों का सवाल है वो मोदीभक्त हैं। वो इससे दुखी जरूर हैं कि उनके बीच मोदी नहीं हैं पर उन्हें गर्व है कि उनके मुख्यमंत्री अब देशभर में राज कर रहे हैं।
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