मोदी सरकार का एक साल पूरा होने वाला है। इस दौरान उनके तौर-तरीकों को लेकर टिप्पणियाँ होने लगी हैं। इसी में शामिल है पीएम मोदी और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के बीच के रिश्ते।
कहा जाता है कि सरकार की सारी ताकत मात्र एक व्यक्ति तक ही सीमित है। वे अपने सहयोगियों को सामने आने का मौका नहीं देते। पार्टी के भीतर और सरकार दोनों में, सत्ता मोदी या उनके विश्वास-पात्रों तक ही सीमित है। उदाहरण के लिए सुषमा स्वराज की बात करते हैं, जो अपनी वरिष्ठता और अनुभव के लिहाज से दबकर काम करती हैं।
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शनिवार की सुबह कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह ने ट्वीट किया, "जिस वक्त नरेंद्र मोदी विदेश में समझौतों पर दस्तख़त कर रहे हैं, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज विदिशा, मध्य प्रदेश में मोदी की भावी उपलब्धियों का प्रचार कर रही हैं।"
इसके ठीक पहले उन्होंने एक और ट्वीट किया, "जिस वक्त प्रधानमंत्री फ्रांस में हवाई जहाज़ खरीद रहे थे, उस वक्त गोवा में हमारे रक्षामंत्री मछली खरीद रहे थे! मिनिमम गवर्नमेंट एंड मैक्सीमम गवर्नेंस।"
कैसा है यह धुआं?
दिग्विजय सिंह अनुभवी नेता हैं। वे शिष्टाचार को बेहतर जानते हैं। प्रधानमंत्री के साथ विदेश मंत्री या रक्षामंत्री के होने की अनिवार्यता नहीं है। इसके पहले किसी ने कभी ध्यान नहीं दिया होगा कि प्रधानमंत्रियों के दौरे में विदेश मंत्री जाते रहे हैं या नहीं।
दिग्विजय सिंह भाजपा की दुखती रग पर हाथ रखा है। मोदी सरकार को असमंजस में डालने का मौका मिलेगा तो वे चूकेंगे नहीं। यह व्यावहारिक राजनीति है। सवाल उस आग का है जो इस धुएं के पीछे है।
क्या यह माने कि दिग्विजय सिंह मोदी जी से कह रहे हैं कि अपने काबिल मंत्रियों की उपेक्षा न करें? अलबत्ता यह बात सुषमा स्वराज पर लागू हो भी सकती है, मनोहर पर्रिकर पर नहीं।
सुषमा स्वराज की अनदेखी?
पिछले साल जब प्रधानमंत्री पहली बार ब्रिक्स देशों के सम्मेलन में भाग लेने ब्राज़ील गए तब कुछ लोगों ने इशारा किया था कि उनके साथ विदेश मंत्री सुषमा स्वराज नहीं गईं।
जापान और ऑस्ट्रेलिया भी नहीं। ब्राज़ील की यात्रा में उनके साथ निर्मला सीतारमण गईं थीं। सितंबर के अमेरिका के दौरे में उनके साथ सुषमा स्वराज भी गईं थीं। सच यह है कि पिछले ग्यारह महीनों में वे प्रधानमंत्री के मुकाबले ज़्यादा देशों की यात्रा कर चुकी हैं। फिर भी यह सवाल क्यों उठ रहा है कि नरेंद्र मोदी अपनी विदेश मंत्री की अनदेखी करते हैं? विदेश मंत्रालय का 'शो' भी वही चलाते हैं।
रिश्तों को तरज़ीह
सच यह है कि मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि विदेश नीति है। अपने शासन के पहले छह महीनों में मोदी ने नौ देशों का दौरा कर लिया था।
अपने से पहले के प्रधानमंत्रियों के मुकाबले यह काफ़ी ज्यादा है। जवाहरलाल नेहरू से मनमोहन सिंह तक ज़्यादातर प्रधानमंत्री विदेश में अपनी छवि का लाभ उठाते रहते हैं।
क्या वे अपनी विदेश मंत्री की अनदेख़ी कर रहे हैं?
अर्थ-व्यवस्था में तेज़ी लाने और विदेशी निवेश को बढ़ाने के लिए यह ज़रूरी भी है। पर क्या वे अपनी विदेश मंत्री की अनदेख़ी कर रहे हैं? ऐसी कोई मान्य परम्परा नहीं है कि प्रधानमंत्री के साथ विदेश मंत्री भी जाएं। साल 2005 में मनमोहन सिंह की अमरीका यात्रा में न्यूक्लियर डील की भूमिका बनी थी।
उस वक्त वे खुद विदेश मंत्रालय देख रहे थे। मंत्रियों की कोई भारी-भरकम टीम उनके साथ नहीं थी। अलबत्ता साल 2013 की यात्रा में उनके साथ विदेश मंत्री साथ सलमान ख़ुर्शीद भी थे।
कहां गए तेवर?
ऐसा भी नहीं कि सुषमा स्वराज मोदी के साथ यात्रा पर जाती ही नहीं। पिछले साल मोदी की अमरीका यात्रा में वे भी शामिल थीं। दिसम्बर में भोपाल में कुछ पत्रकारों ने उनसे यही पूछा तो उन्होंने कहा, "ज़रूरी नहीं कि प्रधानमंत्री के साथ विदेश मंत्री हर एक दौरे में जाए। जी-20 शिखर सम्मेलन में मेरा जाना ज़रूरी नहीं था। वह आर्थिक मंच था, जहाँ विदेश मंत्री की जरूरत नहीं थी। काठमाण्डु के सार्क सम्मेलन में मैं थी।"
इससे पहले वे प्रधानमंत्री के साथ भूटान गईं थीं। दरअसल यात्रा पर साथ जाना या न जाना असल मसला नहीं है। यह बात दबे-छिपे कही जाती है कि सुषमा स्वराज दबाव में काम कर रहीं हैं।
अब नहीं हैं उतनी मुखर
कयास यह भी है कि पिछले साल तत्कालीन विदेश सचिव सुजाता सिंह के हटने और नए विदेश सचिव एस जयशंकर की नियुक्ति में उनका हाथ नहीं था।
इसमें दो राय नहीं कि वे भाजपा की मोदी-पूर्व राजनीति में पार्टी की प्रखर और मुखर वक्ता थीं। लोकसभा में विपक्ष की नेता के रूप में उनकी क़ाबिलीयत का लोहा सब मानते थे।
अब वे उतनी मुखर नहीं हैं। यह बात उनके ट्वीट्स पढ़ने से भी पता लगती है। प्रायः उनके ट्वीट्स मामूली बातों पर होते हैं। मसलन यमन से नागरिकों की निकासी पर उनके अनेक ट्वीट हैं, ज़की उर्र रहमान लख़वी की रिहाई पर एक भी नहीं।