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मथुरा के पेड़े और आगरा के पेठे से जुड़ी है ये खबर

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मथुरा के रेलवे स्टेशन से मथुरा का प्रसिद्ध पेड़ा और आगरा का पेठा गायब है। सात साल से 17 हजार रुपए रोजाना का रेलवे को घाटा देकर भी रेलवे अफसर बेफिक्र हैं। इस समयावधि में रेलवे के जीएम से लेकर अन्य अधिकारियों में से किसी ने मथुरा स्टेशन पर पेड़ा और पेठा बिक्री शुरू कराने में रुचि नहीं दिखाई।
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श्रीकृष्ण की जन्मस्थली मथुरा का पेड़ा पूरे भारत में मशहूर है। यहां तक कि वृंदावन के प्रमुख बांके बिहारी मंदिर में प्रतिदिन सवा मन पेड़े का भोग लगता है और श्रीनाथद्वारा के मंदिर के लिए मथुरा से रोज पेड़ा भोग प्रसाद को जाता है। यहां आने वाले श्रद्धालु मथुरा के पेड़े को प्रसाद के रूप में घर ले जाते हैं। पेडे़ की मिठास में आगरा का पेठा भी साथ देता है।

रेलवे सूत्रों के मुताबिक वर्ष 2008 तक रेलवे की आईआरसीटीसी पेड़े और पेठे की बिक्री के ठेके हर दो वर्ष के लिए उठाती थी। इससे रेलवे को रोजाना 17 हजार रुपए राजस्व मिलता था। 28 फरवरी 2008 के बाद से यहां के रेलवे स्टेशन पर पेड़े और पेठे की बिक्री बंद है। इसकी शिकायत समय-समय पर रेलवे के जीएम से लेकर अन्य जिम्मेदार अधिकारियों से की गई लेकिन किसी अधिकारी ने इसमें रूचि नहीं दिखाई। अब यह व्यवस्था डीआरएम के हाथों में है।
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धड़ल्ले से हो रही है सूजी और बूरा के पेड़े की बिक्री

रेलवे के कुछ कर्मचारियों की सेटिंग के चलते मथुरा जंक्शन और यहां रुकने वाली ट्रेनों में बेहद घटिया क्वालिटी के पेड़े की अवैध बिक्री जारी है। सूजी और बूरा के पेड़े को सांठगांठ पर ठेकेदार धड़ल्ले से बेच रहे हैं।

सात साल से मथुरा के पेड़े और आगरा के पेठे से वंचित मथुरा जंक्शन के मामले में रेलवे सूत्रों के अनुसार ठेकेदारों से जो सेवा मांगी जाती है वह पूरी नहीं हो पा रही है।

सूत्रों के अनुसार समय-समय पर निरीक्षण में सेवा भगत, आरपीएफ, जीआरपी, स्टेशन कर्मियों को समझने के अलावा महीने पर अलग से व्यवस्था करने की शर्तें इतनी कठिन हो चुकी हैं कि पेड़े और पेठे के ठेकेदार ऊपरी खर्चे को उठाने से मना कर देते हैं।
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