विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने देशभर में अवैध रूप से संचालित 21 फर्जी विश्वविद्यालयों की सूची अपनी वेबसाइट पर सार्वजनिक कर दी है। 18 सितंबर को यूजीसी की वेबसाइट पर अपलोड की इस सूची में इंद्रप्रस्थ शिक्षा परिषद इंस्स्टीट्यूशंस एरिया, खोड़ा माकनपुर, नोएडा समेत यूपी के नौ विश्वविद्यालयों को अवैध बताया गया है। खास बात यह है कि इस सूची में सर्वाधिक नाम यूपी से हैं।
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समय-समय पर छात्र हित को ध्यान में रखकर यूजीसी देश में अवैध रूप से संचालित हो रहे विश्वविद्यालयों के नाम सार्वजनिक करती है। इस सूची में उन संस्थानों/यूनिवर्सिटी के नाम को अवैध करार दिया जाता है तो यूजीसी एक्ट 1956 के खिलाफ बिना अनुमति के संचालित होते हैं। इन संस्थानों से ली गई डिग्री अथवा डिप्लोमा को यूजीसी से मान्यता प्राप्त नहीं होती है।
इसके चलते ही यहां से पढ़ने वाले स्टूडेंट्स की डिग्री को सरकारी और प्राइवेट नौकरी में फर्जी करार दिया जाता है। वेबसाइट पर डाली गई सूची में यूजीसी ने साफ लिखा है कि इन सभी संस्थानों/ यूनिवर्सिटी को डिग्री देने का कोई अधिकार नहीं है। यूपी के अलावा बिहार की एक, दिल्ली की पांच, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल की एक-एक यूनिवर्सिटी शामिल है।
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फर्जी यूनिवर्सिटी की सूची
- वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी, यूपी - महिला ग्राम विद्यापीठ यूनिवर्सिटी (वीमेंस यूनिवर्सिटी) प्रयाग इलाहाबाद यूपी - गांधी हिंदी विद्यापीठ, प्रयाग, इलाबाद,यूपी - नेताजी सुभाष चंद्र बोस यूनिवर्सिटी (ओपन यूनिवर्सिटी) अलीगढ़, यूपी - उत्तर प्रदेश यूनिवर्सिटी कोशी कला मथुरा, यूपी - महाराणा प्रताप शिक्षा निकेतन यूनिवर्सिटी, प्रतापगढ़, यूपी - इंद्रप्रस्थ शिक्षा परिषद इंस्स्टीट्यूशंस एरिया, खोड़ा माकनपुर, नोएडा - गुरुकुल विश्वविद्यालय, वृंदावन, यूपी -नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ इलेक्ट्रो कॉम्प्लेक्स होम्योपैथी, कानपुर
मामले पर पीपीएन कॉलेज के चीफ प्रॉक्टर, डॉ. बीडी पांडेय का कहना है कि यूनिवर्सिटी खोलने के लिए कई मानक तय होते हैं। संबंधित डॉक्यूमेंट को यूनिवर्सिटी एक्ट के तहत देने होते हैं। उसके पांच साल बाद यूजीसी की ग्रांट मिलनी शुरू होती है। यूजीसी ने स्टूडेंट्स को सचेत करने के लिए सूची जारी की है। इसीलिए छात्र को दाखिला लेते वक्त यूजीसी की वेबसाइट जरूर देखनी चाहिए।
मानद विश्वविद्यालयों (डीम्ड यूनिवर्सिटी) को मान्यता देने, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की ओर से फंडिंग और छात्रों की छात्रवृत्ति देने में घपलेबाजी जैसे मामलों को लेकर केंद्रीय सतर्कता सूचना आयोग (सीवीसी) ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए है।
भ्रष्टाचार को लेकर सीवीसी ने मंत्रालय को कड़ी नसीहत दी है और सालों से लंबित भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर फटकार लगाई है।
सीवीसी ने मंत्रालय के सामने सवाल उठाया है कि आखिर वह यूजीसी जैसी संस्थानों से समन्वय क्यों नहीं बैठा पा रहा है। सीवीसी ने सीबीएसई को भी मामलों की जांच जल्द निपटाने को कहा है।
शिक्षा के क्षेत्र में भ्रष्टाचार की खबर कोई नई बात नहीं है, लेकिन सीवीसी की ओर से सवाल उठाया जाना गंभीर बात है। सवाल खड़ा हो रहा है कि आखिर भ्रष्टाचार पर निगरानी रखने वाली सरकार की सर्वोच्च संस्था की ओर से सवाल उठाए जाने के बावजूद हालात जस से तस क्यों हैं।
दिलचस्प बात यह है कि सीवीसी ने यूजीसी की फंडिंग और मानद विश्वविद्यालयों को मान्यता देने में घपलेबाजी का मामला पिछले साल भी मंत्रालय के बड़े अधिकारियों के साथ बैठक के दौरान उठाया था। इसके बावजूद हालात नहीं सुधरे।
निवर्तमान केंद्रीय सतर्कता आयुक्त प्रदीप कुमार ने हाल ही में एक समीक्षा बैठक के दौरान मंत्रालय को नसीहत देते हुए कहा था कि यूजीसी की ओर से फंड दिया जा रहा है, लेकिन इस तरह के मामलों में अब भी लोगों की तरफ से शिकायतें आ रही हैं।
सीवीसी ने मंत्रालय को कहा कि उन्हें सूचना मिली है कि यूजीसी में अनुदान को लेकर निरीक्षण में कमी आई है। आयोग ने संस्थानों की मान्यता और संबद्घता के साथ साथ छात्रवृत्तियों के मामलों में भ्रष्टाचार रोकने के लिए तकनीक का इस्तेमाल करने को कहा है। साथ ही सीवीसी ने कहा है कि विश्वविद्यालयों और संस्थानों में वैज्ञानिकों व शिक्षाविदें को खरीद और व्यय मामलों की बारीकियों से भलीभांति अवगत होने की जरूरत है। इसके लिए सीवीसी ने मंत्रालय को समय समय पर कार्यशाला के आयोजन की सलाह दी है।