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दिल्ली गैंगरेप: नाबालिग पर हत्या व गैंगरेप का मुकदमा

Fri, 01 Mar 2013 08:49 AM IST
नई दिल्ली/ब्यूरो
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दिल्ली गैंगरेप मामले में छठे नाबालिग आरोपी के खिलाफ गुरुवार को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने आरोप तय कर दिए। सुनवाई के दौरान आरोपी ने खुद को बेकसूर बताते हुए मुकदमा लड़ने की बात कही। जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (जेजेबी) ने नाबालिग आरोपी के खिलाफ हत्या, सामूहिक दुष्कर्म, कुकर्म, अपहरण, लूटपाट, हत्या के प्रयास, साक्ष्य मिटाना, आपराधिक साजिश समेत कई धाराओं में आरोप तय किए हैं। इस मामले में छह मार्च से बोर्ड के सामने गवाही शुरू होगी। 
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नाबालिग के खिलाफ बोर्ड ने लूटपाट, रास्ता रोकने की धाराओं में भी आरोप तय किए हैं। नाबालिग आरोपी ने अपने साथियों के साथ सामूहिक दुष्कर्म को अंजाम देने से पहले राम आधार नामक शख्स के साथ लूटपाट भी की थी। इस मामले में जेजेबी के समक्ष 12 मार्च से गवाही शुरू होगी।

वसंत विहार पुलिस ने जेजेबी के समक्ष 14 फरवरी को सामूहिक दुष्कर्म मामले में पूरक जांच रिपोर्ट दाखिल की थी। इस मामले में नाबालिग पर हत्या, सामूहिक दुष्कर्म, कुकर्म, अपहरण, हत्या का प्रयास, लूटपाट समेत कई गंभीर आरोप लगाए थे। बता दें कि नाबालिग व अन्य छह आरोपियों ने 16 दिसंबर 2012 की रात 23 वर्षीय युवती के साथ चलती बस में सामूहिक दुष्कर्म किया था।
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दुष्कर्म के बाद आरोपियों ने पीड़िता व उसके मित्र के साथ बुरी तरह मारपीट व लूटपाट की थी। मारपीट के दौरान लगी चोटों के कारण घटना के कई दिन बाद पीड़िता की सिंगापुर के अस्पताल में मौत हो गई थी।

बंद कमरे में मामले की सुनवाई को चुनौती
गैंगरेप मामले की सुनवाई पीड़ित व अभियुक्त पक्ष के हित को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए न कि पुलिस को संरक्षण देने के लिए बंद कमरे में। लीगल रिपोर्टर हर आपराधिक मामले की सुनवाई से जुड़ा होता है और उसे तीसरा पक्ष नहीं माना जा सकता। इस मामले में मीडिया का पक्ष रखते हुए उनकी अधिवक्ता ने कहा कि मीडिया जनता का प्रतिनिधित्व करता है और लोकतंत्र के इस स्तंभ के जरिए ही जागरूकता आई है।

न्यायमूर्ति राजीव शकधर के समक्ष मीडिया कर्मियों की अधिवक्ता मीनाक्षी लेखी ने पुलिस द्वारा बंद कमरे में मामले की सुनवाई करवाने के अधिकार को शक्तियों का दुरुपयोग बताते हुए प्रेस की आजादी का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि मीडिया ने ही इस मामले को प्रकाशित किया व देश की दो सर्वोच्च अदालत हाईकोर्ट व सर्वोच्च न्यायालय ने मीडिया की खबरों पर स्वयं संज्ञान लिया।

उन्होंने कहा कि धारा 327 के तहत बंद कमरे में सुनवाई का अधिकार कुछ खास कारणों से है, लेकिन इस मामले में ऐसा कोई खास कारण नहीं है। उन्होंने कहा पुलिस ने पीड़ित व शिकायतकर्ता युवती की पहचान गोपनीय रखने, अभियुक्तों की सुरक्षा व निष्पक्ष ट्रायल का हवाला दिया है। वहीं, पीड़िता की मौत हो चुकी है और उसके पिता ने स्वयं एमसीडी को शपथपत्र देकर पीड़िता की पहचान सार्वजनिक की है। इसके बावजूद मीडिया ने अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए उसका नाम प्रकाशित नहीं किया।

उधर, शिकायतकर्ता युवक स्वयं अपनी इच्छा से मीडिया के समक्ष आकर साक्षात्कार दे चुका है। ऐेसे में दोनों की पहचान कहां गोपनीय रह गई। सभी अभियुक्त जेल में हैं और पुलिस सुरक्षा में अदालत में पेश किए जाते हैं। अधिवक्ता लेखी ने कहा कि खुली अदालत में सुनवाई अभियुक्त का अधिकार है और खुली अदालत में ही निष्पक्ष सुनवाई हो सकती है। पुलिस अपनी सुरक्षा के लिए बंद कमरे में सुनवाई चाहती है।

उन्होंने पुलिस के उस तर्क को गलत बताया कि अदालत में अत्यधिक भीड़ के कारण सुनवाई सुचारु रूप से नहीं चल सकती। दूसरी तरफ दिल्ली पुलिस के अधिवक्ता दयान कृष्णन ने मीडिया को कवरेज पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा ट्रायल में बाधा आएगी और बंद कमरे में सुनवाई उचित निर्णय है। अदालत ने दोनों पक्षों का सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।
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