तकरीबन डेढ़ वर्ष पूर्व लोकसभा चुनावों में जदयू की हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए नीतीश कुमार ने सीएम पद से इस्तीफा दे दिया और अपनी ही कैबिनेट के एक मंत्री को मुख्यमंत्री पद पर बैठा दिया। गया और जहानाबाद जिले तक सिमटा जीतनराम मांझी का चेहरा एकाएक बिहार की राजनीति में धूमकेतु की तरह उभरा।
नीतीश ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी चुना था, फिर भी बिहार की राजनीति को करीब से देखने वालों ने कहा कि नीतीश ने अपना प्यादा चुना है। मांझी का मुल्यांकन करने वालों ने कहा कि वे नीतीश के रबर स्टांप से अधिक साबित नहीं होंगे। हालांकि ये सभी मूल्यांकन धरे के धरे के रहे गए और नीतीश के पीछे चलने वाले मांझी देखते ही देखते उनसे आगे निकल गए। बिहार की राजनीति में उसके बाद जो उठापटक हुई, वह इतिहास है।
नीतीश से अलग होने के बाद राजग का हाथ थामने वाले मांझी ने पिछले दिनों सीट बंटवारे के मुद्दे पर भाजपा से जिस प्रकार मोल-भाव किया, उससे ये तो कहा ही जा सकता है कि मांझी बिहार की राजनीति में किसी के प्यादे नहीं रह गए बल्कि खुद बड़े खिलाड़ी हो चुके हैं। उन्होंने दशरथ मांझी की तरह पहाड़ तो नहीं तोड़ा, लेकिन पहाड़ जैसी पार्टियों का दंभ जरूर तोड़ दिया।
35 साल तक लो प्रोफाइल ही बने रहे मांझी
बिहार की महादलित जाति के मांझी ने टेलीफोन विभाग की सरकारी नौकरी छोड़कर उस समय राजनीति में कदम रखा था, जब इंदिरा गांधी को बिहार में एक दलित चेहरे की तलाश थी। 1980 में बिहार की कमान कांग्रेस नेता जगन्नाथ मिश्रा के हाथों में थी। वही प्रांत के मुख्यमंत्री भी थे।
मिश्रा ने एक इंटरव्यू में बताया था कि मांझी को राजनीति में आने के लिए उन्होंने ही कहा था। मांझी ने उस समय कांग्रेस से विधानसभा का टिकट लेने का प्रयास भी किया, हालांकि कांग्रेस उम्मीदवारों की अंतिम सूची में वे जगह नहीं बना सके। मिश्रा ने उस समय इंदिरा गांधी को समझाया था कि वे मांझी को एक मौका दें।
जगन्नाथ मिश्रा की कोशिशों से मांझी राजनीति में आ गए। बिहार के सात मुख्यमंत्रियों की काबीना में उन्होंने बतौर मंत्री काम किया। राजनीति के लंबे अनुभव के बाद भी वह लो प्रोफाइल ही बने रहे। लगभग साढ़े तीन दशक पुराने राजनीतिक जीवन का चरमोत्कर्ष तब आया, जब नीतीश कुमार ने उन्हें मुख्यमंत्री पद के लिए चुना।
बिहार के दलित आइकन बन गए मांझी
विधानसभा चुनावों में मांझी ने भाजपा के साथ सीटों के मुद्दे पर मोलभाव इस बिनाह पर की कि वे सूबे में दलितों के बड़े नेता हैं। उन्होंने अपनी पार्टी हिंदुस्तानी अवामी मोर्चा यानी हम के लिए 40 सीटों की मांग की, वह भी तब जब न उनकी पार्टी के पास चुनाव लड़ने का अनुभव था और न ही राजग के अन्य घटक दलों की तरह ठोस ढांचा।
हालांकि मांझी अपने चेहरे ही बल पर ही भाजपा से 20 सीटें पाने में कामयाब रहे। मांझी के राजीतिक जीवन का एक पहलू ये भी रहा कि वे बीता एक वर्ष छोड़ दिया जाए तो 1980 के बाद से वे सत्ताधारी दल के साथ ही रहे। 1980 से 1990 तक वह कांग्रेस जुड़े रहे। 1990 में कांग्रेस की हार के बाद वे जनता दल से जुड़ गए। जनता दल उस समय सत्ता में थी।
1996 में लालू प्रसाद यादव ने जनता दल को तोड़कर नई पार्टी राष्ट्रीय जनता दल बना ली, उस समय मांझी लालू के साथ हो लिए। 2005 राजद की हार के बाद मांझी ने जदयू के साथ नाता जोड़ लिया। सत्ता के साथ ही रहने वाले मांझी का सगुन भाजपा को कितना फलेगा, ये तो वक्त बताएगा।