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संत-महंतों से दूर क्यों भाग रही है भाजपा?

Tue, 25 Mar 2014 01:52 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली
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कभी संतों के जरिए सियासत करने वाली भाजपा इस बार संतों और महंतों से छिटक रही है। 1991 में भाजपा ने साधु संतों के बल पर बड़ी सीटें हासिल की थी, लेकिन इस चुनावी समर में संतों से किनारा कर लिया गया है।
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दरअसल भाजपा समझ चुकी है कि मंदिर मुद्दे के बाद संतों का जादू खत्म हो चुका है लेकिन भाजपा के जरिए अपना सियासी परचम लहराने को बेताब संत हैं कि मानते ही नहीं।

एक तरफ श्रीराम जन्मभूमि न्यास के वरिष्ठ सदस्य व भाजपा के पूर्व सांसद डॉ. राम विलास दास वेदांती का टिकट काट दिया गया है तो दूसरी तरफ पार्टी में कल्याण सिंह के साथ दोबारा शामिल हुए स्वामी चिन्मयानंद भी टिकट न मिलने से नाराज हैं।
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स्वामी जी क्यों रूठे?

टिकट न मिलने से रूठे वेदांती ने तो यहां तक कह दिया है कि ‌यदि दो दिन के भीतर उन्हें फैजाबाद से टिकट नहीं मिला तो हिंदू महासभा या शिवसेना से चुनाव लड़ेंगे।

1991 में बंदायू की सीट जीतकर भाजपा को देने वाले स्वामी चिन्मयानंद भी सीट मांग रहे हैं लेकिन भाजपा कतरा रही है। 2004 के चुनाव में स्वामी जी को जौनपुर का टिकट मिला था लेकिन स्वामी जी हार गए।

भाजपा को भी समझ आ चुका है कि मंदिर आंदोलन के बाद वोटरों पर छाया संतों का खुमार खत्म हो चुका है।

इस बार कितने टिकट

हालांकि ऐसा नहीं है कि भाजपा ने साधु संतों से बिलकुल ही किनारा कर लिया है। उमा भारती (झांसी), निरंजन ज्योति (फतेहपुर), सावित्री फुले (बहराइच) और साक्षी महाराज (उन्नाव) को इस बार टिकट दिया गया है। लेकिन मंदिर आंदोलन के चलते सत्ता का स्वाद चख चुखे संत इन चार सीटों से संतुष्ट नहीं दिख रहे।

एक समय था जब मंदिर मुद्दे की लहर से प्रभावित होकर भाजपा ने संतों को सिर आंखों पर बिठाया और खूब टिकट बांटे। संतों ने भी दिल खोलकर प्रचार किया और सीटें भी जीत ली।

स्वामी चिन्मयानंद के अलावा संत विश्वनाथ दास शास्त्री, स्वामी सुरेशानंद, सच्चिदानन्द साक्षी महाराज को सीटें देकर भाजपा ने धर्म और राजनीति की भागीदारी को भुनाया।
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कांग्रेस है इस परंपरा की रचयिता

भाजपा भले ही संतों को टिकट बांटती रही है लेकिन इस परंपरा की शुरूआत का श्रेय भी कांग्रेस को जाता है। याद कीजिए पहले आम चुनाव में कांग्रेस ने ही हैदराबाद की स्वामी रामानंद पीठ के स्वामी रामानंद और देवरिया के बाबा संत राघवदास को फैजाबाद से उतारा था।

आज हालात बदल चुके है। पहले जहां पार्टियां सतों के जरिए सियासी सरजमीं तलाशती थी, वहीं अब संत सियासत के जरिए अपने सपने पूरे करना चाह रहे हैं।
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