इंद्र कुमार गुजराल को भारत की मशहूर राजनीतिक शख्सियत के तौर पर हमेशा याद किया जाएगा। हालात मुश्किल भले ही रहे हों, इंद्र कुमार गुजराल ने जिंदगी में कभी हार नहीं मानी। इंसानियत और स्नेह उनके व्यक्तित्व की खासियत थी।
प्रधानमंत्री बनने के बाद भी गुजराल की भलमनसाहत जस की तस बनी रही। कॉलेज के दिनों से ही उन्होंने राजनीति में कदम रख दिया था। उन्होंने पहले कम्युनिस्ट पार्टी ज्वाइन की थी, लेकिन विभाजन के बाद गुजराल का पूरा परिवार भारत आ गया। भारत आने के बाद आईके गुजराल कांग्रेस में शामिल हो गए। अपने सिद्धांतों के आधार पर आगे बढ़ते रहे और प्रधानमंत्री की कुर्सी पर आसीन हुए। वे राज्यसभा से आने वाले भारत के पहले प्रधानमंत्री थे।
उनका परिवार पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा हुआ था। मशहूर पेंटर भाई सतीश और बहन उमा के साथ 1931 में 11 साल की उम्र में स्वतंत्रता के संघर्ष में वे भी शामिल थे। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्हें जेल जाना पड़ा। 1945 में इंद्र कुमार गुजराल का विवाह शीला भसीन से हो गया।
गुजराल की प्रशासनिक विशेषताओं को देखते हुए इंदिरा गांधी के कार्यकाल में उन्हें कई महत्वपूर्ण पदों पर तैनात किया गया। प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों के अलावा वे 1967-1976 के दौरान कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे, जो उनकी प्रशासनिक काबिलियत की मिसाल कही जा सकती है। 1975 में आपातकाल के दौरान गुजराल सूचना एवं प्रसारण मंत्री थे। बाद में रूस में भारतीय राजदूत के तौर पर भेज दिया गया। गुजराल आपातकाल से खुश नहीं थे। संजय गांधी से हुई कहा-सुनी के बाद उन्होंने आखिरकार कांग्रेस छोड़ दी और जनता पार्टी का दामन पकड़ लिया।
वे एक कुशल राजनेता, सोशलिस्ट, लेखक और विभिन्न स्पोर्ट्स क्लबों के प्रमुख रहे। उर्दू कविता और कवियों के प्रशंसकों में गुजराल का नाम अग्रणी रहा है। यही नहीं, वे काफी अच्छी उर्दू बोलते थे। उन्होंने उर्दू में कई कविताएं भी लिखीं। इसके अलावा गुजराल ने ‘दि फॉरेन पॉलिसी फॉर इंडिया’ जैसी किताब भी लिखी।
गुजराल 1989 में वीपी सिंह की केबीनेट में विदेश मंत्री थे। कुवैत पर इराक के हमले और खाड़ी युद्ध के दौरान गुजराल की भूमिका इस केबीनेट में काफी महत्वपूर्ण रही थी। 1996 के लोकसभा चुनावों के बाद देश में एचडी देवगौड़ा के नेतृत्व में संयुक्त मोर्चा सरकार बनी। इस सरकार में गुजराल विदेश मंत्री थे। कांग्रेस पार्टी संयुक्त मोर्चा सरकार को बाहर से समर्थन दे रही थी। लेकिन अप्रैल 1997 में कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया और मोर्चा सरकार गिर गई। मध्यावधि चुनाव से बचने के लिए कांग्रेस किसी और नेता के नेतृत्व में संयुक्त मोर्चा सरकार को एक बार फिर समर्थन देने पर राजी हो गई। इस बार आईके गुजराल को प्रधानमंत्री बनाया गया।
गुजराल के फैसलों पर उनके व्यक्तित्व की छाप साफ तौर पर देखने को मिलती है। उनका ‘गुजराल डॉक्टि्रन’ का सिद्धांत एक तरह से मील का पत्थर बन गया था। दरअसल ‘गुजराल डॉक्टि्रन’ में पड़ोसी देशों से हर हाल में बेहतर संबंध स्थापित करने पर जोर दिया गया था। पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका समेत तमाम पड़ोसी देशों में भी गुजराल के इस दोस्ताना रवैये की काफी प्रशंसा की गई। बहरहाल, एक राजनेता के तौर पर उनकी छवि हमेशा बेदाग रही।
(वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर से उमाशंकर मिश्र की बातचीत पर आधारित)
जालंधर में बसती थी जान
पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल कहीं भी हों, उनका दिल जालंधर में बसता था। उनकी मां पुष्पा गुजराल जालंधर की पार्षद थी और मां के चहेते आईके गुजराल ने जालंधर को जहां खूब प्यार दिया, वहीं इसको विश्व मानचित्र में लाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वे जब सूचना व प्रसारण मंत्री बने थे तो उनका प्रेम जालंधर से उजागर हो गया था, जालंधर को दूरदर्शन उनकी बदौलत ही मिला था।
प्रधानमंत्री बनने के बाद तो जालंधर की चांदी हो गई थी। कपूरथला मार्ग पर साइंस सिटी का नींव पत्थर गुजराल जी ने रखा। सीएम प्रकाश सिंह बादल ने तो स्टेज से कह दिया कि इसका नाम प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल की माता पुष्पा गुजराल के नाम पर रखा जाना चाहिए, आज यहां की साइंस सिटी विश्वविख्यात है।
वहीं प्रधानमंत्री रहते हुए गुजराल से जालंधर में रहने वाले उनके परम मित्र दीपक जालंधरी ने कहा कि पानी की काफी कमी है, कई इलाकों में ट्यूबवेल नहीं है। जालंधर नगर निगम एक करोड़ की मांग कर रहा था, गुजराल जी ने कहा कि मेरे शहर के लिए बस एक करोड़, नहीं दस करोड़ ले जाओ और 10 करोड़ का चेक थमा दिया। नगर निगम ने 10 करोड़ से जालंधर में कई ट्यूबवेल लगाए और बाकायदा इसकी सूची पीएम कार्यालय भेजी थी। जालंधर का मेडिकल कालेज भी इन्हीं की देन है। इसके अलावा दोमोरिया पुल भी उनकी देन है, जिन्होंने इसको पास करवाया था।
...और भी कई ऐसी यादें हैं
-इंद्र कुमार गुजराल 1989 में जब चुनावी जलसे को संबोधित करने के लिए गढ़ा गए थे, वहां पर 11 साल की बच्ची ने उनसे पूछा कि अंकल हमारे यहां शौचालय कब बनेंगे। गुजराल को पता चला कि यहां पर शौचालय ही नहीं हैं, तो उन्होंने भरी स्टेज से वायदा किया और चुनाव जीतते ही पहले पूरे इलाके में सीवरेज सिस्टम डलवाया।
-वे वर्कर की कद्र करते थे, उनके साथी अगर कोई वायदा कर लेते तो वह उसे निभाने में पीछे नहीं हटते थे। उनके साथी दीपक जालंधरी ने एक वायदा फगवाड़ा में रहने वाले वर्करों से कर लिया और वे अपना वायदा पूरा करने फगवाड़ा तक गए।
-वे एक बार करतारपुर इलाके से निकल रहे थे, काफी लोग धूप में खड़े हुए थे। उनको देखकर अपने साथियों से पूछा तो कहा गया कि यह बस का इंतजार कर रहे हैं, चुनाव जीतते ही 4 लाख रुपये तत्काल भेजकर करतारपुर में यात्रियों के लिए शेड बनवा दिया था।
-सुरिंदर पाल