मुंबई सीरियल धमाकों में मदद करने के लिए दोषी ठहराए गए याक़ूब मेमन को फांसी दी जा चुकी है लेकिन उन धमाकों और बाद में हुए चरमपंथी हमलों ने मनोरंजन की राजधानी कहे जाने वाले मुंबई को हमेशा के लिए बदल दिया।
मुंबई की फितरत में कौन कौन से बदलाव आए हैं, बता रही हैं लेखक बाची करकरिया। उस समय बॉम्बे के नाम से पुकारने जाने वाला शहर महज दो घंटे और 10 मिनट में दहल गया।
शुक्रवार, 12 मार्च 1993 को दोपहर डेढ़ बजे से लेकर तीन बजकर 40 मिनट के बीच शहर तबाही के मंजर में तब्दील हो गया था।एक के बाद एक 13 बम धमाकों ने शहर को पहचान देने वाली इमारतों को निशाना बनाया।
इस वजह से भड़के लोग
सबसे पहला निशाना बना आर्थिक गतिविधि का प्रतीक बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज।
दक्षिण की ओर एयर इंडिया की इमारत से लेकर पश्चिम में लैंड्स एंड में सी
रॉक होटल तक इन धमाकों से गूंज सुनी गई, लैंड्स एंड समंदर में निकला जमीन
का हिस्सा है।
बॉलीवुड की अजीम शख्सियत वी शांताराम का प्लाजा सिनेमा और
बिड़ला परिवार से जुड़ा सेंचुरी बाजार तक मलबे बिखरे हुए थे। दक्षिणपंथी
पार्टी शिवसेना का मुख्यालय इन हमलों का एक स्वाभाविक निशाना था क्योंकि ये
धमाके दिसंबर 1992 और जनवरी 1993 में हुए सांप्रदायिक दंगों का बदला लेने
के लिए किए गए थे, जिनमें बड़ी संख्या में मुसलमान गए थे।
मुंबई में ये
दंगे हिंदू कट्टरपंथियों द्वारा दिसम्बर 1992 में अयोध्या में बाबरी
मस्ज़िद को ढहाए जाने की वज़ह से भड़के थे। इन दंगों की वजह से ख़ुद मुंबई
का मानस पहले ही बंट चुका था।
लेकिन जल्दी ठंडी हो गई आग
सांप्रदायिकता आर्थिक सेहत के लिए
नुक़सानदायक होती है और ऐतिहासिक रूप से आर्थिक गतिविधि तो बॉम्बे की रीढ़
रही है, इसलिए जल्द ही यह आग ठंडी हो गई।
शहर की बहादुर शांति समितियों की
कोशिशों से ऐसा हुआ, दूसरी वजह यह भी है कि यहां हिंदू व्यापारी मुस्लिम
सप्लायरों और मजदूरों के बगैर काम नहीं कर सकते थे।
साल 1993 के धमाकों में
257 लोगों की मौत हुई और 1,400 लोग घायल हुए। यह तबाही मुंबई की चेतना के
लिए भी एक भारी झटका साबित हुई, पहली बार भारत के एक मेट्रोपॉलिटन शहर का
चरमपंथ से सामना इतने बड़े पैमाने पर हुआ था।
अपराध और गैंगवार
मुंबई में अपराध और गैंगवार
दशकों से होते रहे हैं, सोने की तस्करी सभी तरह के गैर कानूनी धंधों पर
हावी रही है। स्मगलर रोमांटिक शख़्सियत हुआ करते थे और उस समय दाउद
इब्राहिम का बड़ा नाम था।
वे एक कांस्टेबल के बेटे थे जो शहर के सबसे
ताक़तवर अंडरवर्ल्ड डॉन बन चुके थे और आखिरकार भारत के मोस्ट वांटेड इंसान
भी बन गए। टाइगर मेमन के साथ इब्राहिम को इन हमलों के मास्टरमाइंड के रूप
में देखा जाता था, वे फरार हो गए थे।
पहली बार उनका गैंग अपने आर्थिक हितों
के लिए होने वाली हिंसक कार्रवाईयों से हट कर राजनीतिक बदले की
कार्रवाईयों में शामिल हुआ और पूरा शहर उनके निशाने पर आ गया।
लगातार होते रहे धमाके
यह सच है कि
मुंबई कई बार चरमपंथी हमलों का शिकार हुआ, लेकिन शहर का इससे बहुत कम
लेनादेना रहा है. साल 2003 में शहर एक बार फिर सन्न रह गया, जब गेटवे ऑफ़
इंडिया और आभूषण व्यापार का केंद्र रहा झवेरी बाज़ार धमाकों से दहल गया।
साल 2006 में मुंबई के व्यस्त लोकल ट्रेनों के ट्रैक पर ऑफ़िस समय में
सीरियल धमाके हुए, जिसमें 180 लोग मारे गए। इसके बाद नवम्बर 2008 में एक और
बड़ा हमला हुआ, जिसमें 60 घंटे तक कार्रवाई चली और इसे भारत में सबसे बड़े
चरमपंथी हमले के रूप में देखा गया।
रेलवे स्टेशन, ताज होटल और यहूदियों के
एक सांस्कृतिक केंद्र पर हुए हमलों में 166 जानें गईं। सुरक्षा बलों की
कार्रवाई में नौ हथियारबंद हमलावर भी मारे गए।
ये हैं मुंबई की स्पिरिट
इस हमले ने मुंबई और भारत को
वैश्विक चरमपंथ की त्रासदी झेलने वाली जगहों की सूची में डाल दिया। सदमे
के संदर्भ में कहें तो यह हमला 1993 धमाकों जितना व्यापक था।
जुलाई 2011
में एक भीड़ भाड़ वाले व्यापारिक केंद्र में भी थोड़ी- थोड़ी देर पर तीन
धमाके हुए थे, जिसमें 26 जानें गईं, लेकिन 1993 के बम धमाकों की राख से एक
भावना बनी, जिसे ‘मुंबई की स्पिरिट’ कह सकते हैं।
बेहद आम लोग भी घायलों को
बचाने दौड़ पड़े, कैब और कारों को रोक रोक कर घायलों को अस्पताल पहुंचाया।
शाम होते होते, ब्लड बैंकों में रक्तदान करने वालों की भीड़ लग गई।
हर बार दिखेगी ये स्पिरिट
अगले
दिन लोग धमाकों से उजड़ी इमारतों में स्थित अपने दफ़्तरो में काम करने
पहुंचे। किसी ने भी आधिकारिक निर्देश या सलाह का इंतज़ार नहीं किया। यह
हैरान कर देने वाली बात थी और अपने आप में अनोखा था।
खुद से खड़ा होने की
मुंबई की यह ‘स्पिरिट’ बार बार दिखेगी। साल 2006 में जब धमाके हुए तो रेलवे
पटरियों के किनारे झुग्गियों में रहने वाले लोग मौके पर दौड़ गए और खून से
लथपथ घायलों को अपनी बेडशीट में लपेट अस्पताल पहुंचाया।
यह बहादुरी तब भी
दिखी थी जब 2005 में तीन दिनों तक पूरा शहर जल जमाव की चपेट में आ गया
था.हर संकट से उबर जाने की मुंबई की यही क्षमता एक के बाद एक होने वाले
हमलों को सहने की ताक़त देता है।
ये है गर्व करने वाली बात
यह मानना ठीक नहीं होगा कि ये कार्रवाईयां
संकट से घिरे उन लोगों की हैं, जिनके पास कोई विकल्प नहीं था। जो
जिम्मेदारी सरकार या शहरी प्रशासन की होनी चाहिए उसे नागरिकों पर छोड़
देना।
आधिकारिक उदासीनता के एक बहाने की तरह देखा जाएगा, लेकिन जिस तरह
मुंबई संकट से होकर गुजर कर निकलता रहा है, यह दिखाता है कि यह 'स्पिरिट'
ही सबसे अधिक गर्व करने वाली थाती है।
इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि
भारत के अन्य शहरों में चरमपंथ के साए में रह रहे लोगों के लिए यह एक मशाल
की तरह है।
(बाची करकरिया मुंबई में रहने वाली लेखक और पत्रकार हैं।)