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मोदी के क्षेत्र में ही पिछड़ गई ये परियोजना

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक ओर ढांचागत संरचनाओं के विकास में तेजी से काम चाहते हैं तो दूसरी ओर उनके अपने निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी में ही राजमार्ग की एक परियोजना पर ऐसी गति से काम हो रहा है कि कछुआ भी शरमा जाए।
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केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद पिछले छह महीने में भी इसके काम में उल्लेखनीय प्रगति नहीं हो पाई है। देश के सबसे पुराने राजमार्ग एनएच-2 (जीटी रोड के नाम से विख्यात) पर वाराणसी से बिहार के औरंगाबाद तक के 192 किलोमीटर हिस्से को छह लेन में बदलने का ठेका सोमा आइसोलक्स कंपनी को मिला है।

कंपनी ने 12 सितंबर 2011 को वहां काम शुरू किया और समझौते के मुताबिक 910 दिनों में इसे पूरा किया जाना था। मतलब 9 मार्र्च 2014 तक यह परियोजना पूरी हो जानी थी। लेकिन, अभी तक एक चौथाई काम भी पूरा नहीं हो पाया है।
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दिलचस्प बात यह है कि काम भले ही पूरा नहीं हुआ हो, लेकिन जनता से टोल टैक्स वसूला जा रहा है। एनएच के इस हिस्से पर 16 दिसंबर 2013 तक ही टोल के रूप में 460 करोड़ रुपये वसूले जा चुके थे।
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नौ मार्च 2014 तक पूरा होना था काम

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के एक अधिकारी का कहना है कि अभी तक वहां से टोल से करीब 700 करोड़ रुपये की वसूली हो चुकी होगी, जबकि खर्च सिर्फ 373 करोड़ रुपये हुए हैं।

इस तरह इस सड़क को बनाने में ठेकेदार ने अपनी जेब से एक भी पैसा खर्च नहीं किया है क्योंकि वहां सड़क बनाने में अभी तक जितनी राशि खर्च हुई है, उससे ज्यादा रकम टोल से वसूली जा चुकी है।

इस परियोजना के लिए स्वतंत्र इंजीनियरिंग सेवा उपलब्ध कराने वाली कंपनी इंटरनेशनल कंसल्टेशन एंड टेक्नोक्रेट्स ने 16 अक्तूबर 2014 को दी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि ऐसा लगता है कि ठेकेदार काम के प्रति गंभीर नहीं हैं और इस पर आगे काम नहीं करना चाहते।

उसके मुताबिक अभी तक वहां महज 18.11 फीसदी ही काम पूरा हुआ है। इस परियोजना की कुल लागत 2,848 करोड़ रुपये हैं, जिनमें से अभी तक महज 373.31 करोड़ रुपये ही खर्च हुए हैं।

जमीन नहीं मिलने का बहाना बना सकती है कंपनी
देखा जाए तो इस परियोजना में सरकारी अधिकारी भी रुचि नहीं ले रहे हैं क्योंकि अभी तक कंपनी को परियोजना के लिए वांछित जमीन नहीं मिली है।

यही एक शर्त है जिसके सहारे ठेकेदार सरकार पर भारी पड़ते हैं क्योंकि जब उन पर कार्रवाई की बात शुरू होती है तो वे पूरी जमीन नहीं मिलने की बात करने लगते हैं। परियोजना के लिए समझौते पर हस्ताक्षर होने के 90 दिन के अंदर ठेकेदार को पूरी जमीन देना था, लेकिन यह काम अभी तक पूरा नहीं हो पाया है।
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