देश जब आजाद हुआ था तब आजादी एक मिशन थी, लेकिन आज 68 साल बाद भारत में युवाओं की तीसरी पीढ़ी तैयार हो चुकी है। इस पीढ़ी के लिए आजादी का मतलब संवैधानिक परिभाषा नहीं, बल्कि रूढ़िवाद में जकड़े परिवार, समाज और राष्ट्र से खुलेपन की अपेक्षा है।
अब आजादी का मतलब है घरों में बेटी के जन्म पर उत्सव, बंधन मुक्त इंटरनेट, खुलेपन वाली लाइफ स्टाइल और ब्रॉड सोच। अमर उजाला ने इस संबंध में राजनीति, बॉलीवुड, खेल और प्रतियोगी परीक्षा टॉपरों से बात की तो सभी ने स्वीकार किया कि अब पुरानी सोच से काम नहीं चलेगा।
आजादी के बाद वाली दो पीढ़ियों ने कुर्बानियां देने के बाद घर और समाज में बहुत कुछ बर्दाश्त किया है, अब उनसे उबरने की बारी है। बॉलीवुड अभिनेत्री आलिया भट्ट सहित कई युवा बेटियों ने सवाल उठाया कि बेटियों के जन्म पर आजादी के 68 साल बाद भी घरों में उत्सव नहीं मनाया जाता, ऐसा क्यों ?
सेनानियों पर हो अलग किताब प्रकाशित
मैगसेसे पुरस्कार विजेता अंशु गुप्ता ने कहा कि पुराने तौर तरीके छोड़ने के
लिए अब सोच बदलनी होगी। बॉलीवुड अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने कहा कि
युवाओं को बड़े काम करने के लिए चाहिए कि वे अपने मन से डर को निकालें और
खुद पर भरोसा रखें।
लंदन ऑलम्पिक में कांस्य पदक जीतने वाले योगेश्वर दत्त
सोनीपत में पहलवानों
के साथ तिरंगा फहराएंगे, लेकिन खेद जताया कि नई पीढ़ी को देश के लिए
कुर्बान होने वाले सेनानियों के बारे में कुछ मालूम नहीं है।
उन्होंने
स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों पर एक अलग किताब प्रकाशित कर उसे आवश्यक रूप
से पढ़ाने की अपील की है।
अभी चाहिए मूलभूत आजादी
बीजू जनता दल के सांसद जय पांडा का कहना है कि ‘युवाओं को मूलभूत आजादी अभी नहीं मिली है। देश में इंटरनेट की पहुंच बहुत सीमित है, इसे खुली सोच के साथ युवाओं तक पहुंचाना चाहिए। शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए भी युवाओं को आजादी की दरकार है।’
वहीं वर्ष 2015 में आईएएस परीक्षा टॉप करने वाली ईरा सिंघल की सोच बहुत साफ है ‘लड़कियों को खुली हवा में सांस लेने का हक है, लेकिन आज भी वे घर की चारदीवारी में बंद हैं। अब खत्म होना चाहिए लड़कियों से भेदभाव वाला रूढ़िवादी नजरिया।’
फिल्म अभिनेत्री आलिया भट्ट महिलाओं की स्वतंत्रता की पक्षधर हैं और चाहती हैं कि बेटी के जन्म पर भी घरों में जश्न मनाया जाना चाहिए। उनका मानना है कि समाज में महिलाओं से होने वाला भेदभाव हर सूरत में खत्म होना चाहिए।