बिहार की राजनीति में कांग्रेस खासी तेजी से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को साधने में जुटी है। इसके लिए कांग्रेस रणनीतिकारों ने नीतीश को राहत और लालू को आफत का नया दांव चला है।
कांग्रेस ने एक तरफ जद(यू) के भाजपा से अलग होने के बाद विधानसभा में विश्वास मत के दौरान नीतीश सरकार को समर्थन और केंद्र सरकार द्वारा बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की नीतीश कुमार की मांग को पूरा करने की कवायद के बाद अब उद्योग मामलों की संसद की स्थाई समिति के अध्यक्ष का पद जद(यू) को देकर साफ संकेत दे दिया है कि लोकसभा चुनावों तक कांग्रेस बिहार में जद(यू) के साथ गठबंधन की ओर तेजी से बढ़ रही है।
वहीं दूसरी ओर संसद में विचाराधीन लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम संशोधन विधेयक को भाजपा की आड़ में स्थाई समिति को भेजने का दांव खेलकर राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव के लिए मुश्किल पैदा करने की तैयारी है।
जद(यू) अध्यक्ष शरद यादव और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दोनों के बेहद भरोसेमंद पार्टी महासचिव और राज्यसभा सांसद के.सी.त्यागी को उद्योग मामलों की संसदीय स्थाई समिति का अध्यक्ष बनाकर कांग्रेस रणनीतिकारों ने संसद सत्र में जद(यू) द्वारा दिए गए सहयोग का दोस्ताना जवाब देकर आगे का रास्ता खोल दिया।
गौरतलब है कि पहले यह पद डीएमके के सांसद तिरुची शिवा के पास था जिनका राज्यसभा का कार्यकाल समाप्त होने के बाद डीएमके अध्यक्ष करुणानिधि अपनी पुत्री कॉनोमॉझी को देना चाहते थे जो शिवा के स्थान पर चुन कर राज्यसभा में आई हैं।
लेकिन डीएमके के आग्रह को दरकिनार करके यह पद उन के.सी.त्यागी को दिया गया है जो इन दिनों जद(यू) के रणनीतिकार हैं।
दूसरी तरफ लोक प्रतिनिधित्व कानून 1951 में प्रस्तावित संशोधन विधेयक को संसद की स्थाई समिति को सौंपने की भाजपा की मांग मान लेने से राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव की मुसीबत बढऩे की आशंका है।
अभी इस कानून के मुताबिक अगर किसी को दो साल या उससे ज्यादा की सजा किसी अदालत से सुना दी जाती है तो वह चुनाव नहीं लड़ सकता जब तक कि ऊपरी अदालत द्वारा उसे स्थगित न किया जाए।
हाल ही में इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट केआदेश के बाद सभी राजनीतिक दल इस कानून में संशोधन की मांग कर रहे हैं। इसके बाद सरकार संशोधन विधेयक लेकर आई। भाजपा ने इसे स्थाई समिति को सौंपने की मांग की है।
सुप्रीम कोर्ट आदेश के बाद सबसे ज्यादा मुश्किल में लालू प्रसाद यादव हैं। चारा घोटाले में रांची की एक अदालत में चल रहे एक मामले का फैसला जल्दी ही आने वाला है।
अगर यह संशोधन विधेयक टला और फैसला विपरीत आया तो राजद अध्यक्ष की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। इस मामले में लालू सुप्रीम कोर्ट तक गए थे, लेकिन उन्हें राहत नहीं मिली।