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SP की जीत में BJP सांसद की अहम भूमिका

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सियासत में सबकुछ जायज है। शायद इसी फलसफे पर चलते हुए भाजपा के सांसद सर्वेश सिंह ने इस चुनाव में पार्टी की मदद न करने का फैसला कर लिया था। उन्होंने अपने परंपरागत वोटरों तक से यह नहीं कहा था कि भाजपा को वोट दें बल्कि भाजपा प्रत्याशी के खिलाफ वोट के लिए भी अंदरखाने माहौल बनाया गया था।
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बेटे सुशांत को राजनीति में उतारने के मकसद से सर्वेश सिंह ने टिकट दिलाने की कोशिश की थी। उन्होंने बाकायदा इसकी घोषणा भी कर दी थी हालांकि अब चुनावों के दिन उन्होंने कहा कि चुनाव के लायक तो उनके बेटे की उम्र नहीं थी। राजपाल सिंह को प्रत्याशी बनाए जाने के साथ ही अंदरखाने यह खबरें आने लगी थीं कि सर्वेश सिंह नाराज हैं और प्रचार में भी नहीं निकल रहे।

भाजपाई और खुद राजपाल सिंह चौहान ने भी उनसे प्रचार का आग्रह किया लेकिन वह आखिरी वक्त तक भाजपा के साथ प्रचार में नहीं निकले। भाजपा का यहां प्रचार युद्ध में कमजोर पड़ने का मतलब था कि सपा को एक तरह से वाक ओवर देना,  वही हुआ। यहां पहले से ही हिंदू मुस्लिम आधार पर वोटिंग तय मानी जा रही थी। सर्वेश सिंह के परंपरागत वोटर तो बहुत कम घर से निकले। सबसे कम वोटिंग तो उनके गांव रतूपुरा में ही हुई।
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ठाकुरद्वारा में पहली बार लहराया सपाई परचम

यह पहला मौका है जब सपा ने ठाकुरद्वारा में जीत हासिल की। भाजपा की इस परंपरागत सीट को छीनकर सपा ने तगड़ा झटका दिया है। सर्वेश सिंह के सांसद बनने के बाद खाली हुई इस सीट पर भाजपा ने राजपाल सिंह और सपा ने नवाब जान को प्रत्याशी बनाया था। चुनाव में भाजपा में खेमेबंदी रही जिसका फायदा सपा प्रत्याशी ने उठाया और 27023 वोटों की बड़ी जीत हासिल की।

ठाकुरद्वारा सीट पर पांच बार भाजपा से सर्वेश सिंह विधायक रहे हैं जबकि तीन बार उनके पिता रामपाल सिंह कांग्रेस से विधायक रहे हैं। इसबार भी वह इस सीट पर अपने लड़के के लिए टिकट मांग रहे थे लेकिन लेकिन परिवार वाद से पार्टी को दूर रखने के नियम में बंधी पार्टी ने उनके बेटे को टिकट नहीं दिया। राजपाल सिंह को लोग बाहरी मानते रहे जिसका नुकसान भी उप चुनाव में हुआ।

सपा के नवाबजान 2012 के विधान सभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर मैदान में थे। इसबार पार्टी बदलने के साथ ही किस्मत बदली और विधायक बने। यह पहला मौका है जब सपा को इस सीट पर जीत हासिल हुई। इससे पहले चार बार कांग्रेस, पांच बार भाजपा, दो बार बसपा, एक बार जनता पार्टी और दो बार एसडब्लूए, एक बार आईसीजे के विधायक रह चुके हैं।

मंत्री और विधायकों की फौज का था डेरा

लोकसभा चुनाव में करारी शिकस्त मिलने के बाद सपाई फौज उपचुनाव को फतह करने के लिए पूरी ताकत से जुटी थी। ठाकुरद्वारा सीट को जीतने के लिए मंत्री, विधायक और आम कार्यकर्ता तक लगे रहे। कैबिनेट मंत्री राज किशोर, रिमोट सेंसिंग एप्लीकेशन सेंटर के अध्यक्ष कुलदीप उज्जवल और राज्यमंत्री कमाल अख्तर लगातार ठाकुरद्वारा में बने रहे। गांव और मुहल्लों में जाकर पब्लिक पर सपाई रंग चढ़ाने की कोशिश की। कामयाबी मिली और सपा ने भाजपा से सीट छीन ली।

मंत्रियों के अलावा मुरादाबाद जनपद के सभी विधायकों को सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने ठाकुरद्वारा सीट पर लगा दिया था। सभी से कहा गया था कि वह ठाकुरद्वारा में रहकर चुनाव प्रचार करेंगे। मुलायम सिंह ने विधायकों की मीटिंग में भी साफ साफ कह दिया था कि ठाकुरद्वारा सीट उन्हें चाहिए। पार्टी नेताओं को अल्टीमेटम तक दिया गया कि अगर सीट हारी तो वह भी हटा दिए जाएंगे। खैर सभी ने यहां पूरी ताकत लगाई।

कैबिनेट मंत्री शिवपाल सिंह यादव और सपा के राष्ट्रीय महासचिव प्रोफेसर रामगोपाल यादव ने यहां आकर चुनावी सभाएं की। स्वास्थ्य मंत्री अहमद हसन ने भी चुनावी सभाएं की थीं। गांव और मुहल्लों में जाकर पार्टी की नीतियों का बखान किया गया। सरकार द्वारा कराए जाने वाले कामों को गिनाया। रिमोट फेंसिंग के अध्यक्ष कुलदीप उज्जवल ने इसे पार्टी की नीतियों और कार्यकर्ताआं की मेहनत की जीत करार दिया।

बिजनौर में साइकिल दौड़ी, मुरझाया कमल

बिजनौर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में न तो मोदी का जादू चला और न ही बहुसंख्यक मतों के ध्रुवीकरण की सियासत जोर पकड़ पाई। उपचुनाव में साइकिल ने कमल को रौंद डाला। सपा प्रत्याशी रुचिवीरा ने भाजपा प्रत्याशी हेमेंद्रपाल सिंह को 11 हजार 567 वोटों से शिकस्त देकर बिजनौर सीट पर इतिहास को बदल दिया। बिजनौर सीट पर अब तक के इतिहास में पहली बार सपा ने बाजी मारी है। बिजनौर सीट पर पहले भाजपा ही काबिज थी। भाजपा में अंदरूनी कलह व सांसद कुंवर भारतेंद्र सिंह के विरोध को हार की वजह माना जा रहा है।

सुबह आठ बजे से किरतपुर रोड स्थित वेयरहाउस में मतगणना शुरू हुई। 25 राउंड में मतगणना हुई। शुरू में भाजपा प्रत्याशी हेमेंद्रपाल सिंह करीब आठ सौ मतों की लीड लेकर चले, लेकिन छठे राउंड के बाद साइकिल की रफ्तार बढ़ गई। मतों का अंतर भी बढ़ता गया। अंतिम राउंड तक सपा प्रत्याशी रुचिवीरा ने भाजपा प्रत्याशी हेमेंद्रपाल सिंह को 11 हजार 567 वोटों से शिकस्त दी। रूचिवीरा को कुल 1,01,748 वोट व भाजपा प्रत्याशी हेमेंद्रपाल सिंह को 90,181 वोट मिले। चुनाव में भाजपा व सपा के बीच ही कश्मकश की स्थिति रही। कांग्रेस के हुमायूं बेग चुनाव में बिल्कुल भी नहीं दौड़ पाए। उन्हें महज 2585 वोट ही मिले हैं। बिजनौर के इतिहास पर गौर करे तो इस सीट पर सपा प्रत्याशी को पहली बार विजय मिली है। बसपा व रालोद के उप चुनाव नहीं लड़ने से भाजपा नेता बसपा व रालोद का वोट बैंक अपने ही पक्ष में मान रहे थे, लेकिन सारे कयास फेल हो गये।

अल्पसंख्यक मतों का धुव्रीकरण पूरी तरह से सपा की ओर रहा। भाजपा बहुसंख्यक मतों को पूरी तरह नहीं रिझा पाई। करीब 40 प्रतिशत बहुसंख्यक मतदाता भी सपा की ओर ही आकर्षित हो गए। बहुसंख्यक मतों का 60 प्रतिशत वोट ही भाजपा को मिला है। बहुसंख्यक वोट छिटकने की वजह भाजपा सांसद कुंवर भारतेंद्र सिंह का बिजनौर सीट पर जबरदस्त विरोध व अंदरूनी कलह को माना जा रहा है। भाजपा मूल वोट बैंक भी इस बार भाजपा से खिसक गया। जाट व दलितों का ज्यादातर वोट सपा को ही मिला है।

मोदी फैक्टर की खुमारी में ‘इनरस्विंग’ महसूस ही नहीं कर पाए

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में होने के नाते रोहनिया विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव पर सारे देश की निगाहें थीं। पर स्थानीय स्तर पर यह चुनाव दो पटेलों के बीच था। अपना दल की सांसद अनुप्रिया पटेल और अखिलेश सरकार में मंत्री सुरेंद्र पटेल। इसका सीधा असर भी इन्हीं दोनों पर पड़ना था। राजनीतिक गलियारों में आकलन भी यही है कि पटेल बहुल सीट पर भाजपा के समर्थन के बावजूद अपनी मां को न जिता पाना, पहली बार में विधायक व सांसद बनने वाली अनुप्रिया के राजनीतिक भविष्य पर भारी पड़ सकता है। वहीं सुरेंद्र पटेल, मुलायम के दरबार में और प्रभावशाली हो सकते हैं, मंत्रिपरिषद में उनका दर्जा भी बढ़ सकता है।

बेनी प्रसाद वर्मा के पार्टी से अलग होने के बाद खाली हुई जगह को भी इनके जरिए भरने की राजनीतिक कोशिश भी हो सकती है। इस उपचुनाव से भले ही केंद्र सरकार और मोदी की सेहत पर कोई असर न पड़ने वाला हो पर विपक्ष को कुछ समय के लिए उन पर हमला करने का एक  औजार तो मिल ही गया है।

यूं तो वाराणसी भाजपा का गढ़ जरूर रहा पर रोहनिया में उसकी पैठ फिलहाल दस सालों में कभी नहीं बन पाई। 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में वाराणसी से सांसद रहे मुरली मनोहर जोशी इस विधानसभा क्षेत्र में बसपा, सपा और अपना दल के बाद चौथे नंबर पर थे। पिछले विधानसभा चुनाव में भी भाजपा के संजय राय चौथे नंबर पर बमुश्किल आ पाए। पर विजेता अपना दल  के भाजपा से गठबंधन के बाद इलाके की तसवीर कुछ बदलती नजर आई। तीन महीने पहले संपन्न लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी ने इस विधानसभा सीट पर 81839 वोटों से जीत हासिल की थी।

चूंकि इस दौरान नरेंद्र मोदी की छवि पर कोई सवाल नहीं उठा और क्षेत्र में पटेल वोटों की बहुलता थी ही। इसी के बल पर अपना दल उम्मीदों के साथ चुनाव लड़ रहा था। अनुप्रिया ने मेहनत भी खूब की, पर अपने आक्रामक प्रचार के बावजूद लोकसभा चुनाव जैसा माहौल नहीं रच सकीं। पटेल मतदाताओं पर उन्होंने अपनी पकड़ कमजोर नहीं होने दी पर भाजपा के सहयोग के बावजूद सवर्णोँ को अपने पाले में खींचने में कामयाब नहीं रही।
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स्थानीय भाजपा नेतृत्व उदासीन रहा

इसका एक प्रमुख कारण यह रहा कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का सहयोग हासिल कर पाने के बावजूद वह स्थानीय स्तर के नेताओं व कार्यकर्ताओं से तालमेल नहीं बिठा पाईं। चुनाव प्रचार के प्रथम चरण में भाजपा नेता तो उनके लिए घरों से ही नहीं निकले, पर जब अनुप्रिया ने हाईकमान से शिकायत की तो वे मन मारकर पक्ष में घूमे तो पर लोकसभा चुनाव जैसी दिलचस्पी नहीं ली।

मोदी की लोकसभा सीट पर कोई गड़बड़ी न होने पाए इसलिए नेतृत्व ने योगी आदित्यनाथ, केंद्रीय मंत्री कलराज मिश्र व रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा के कार्यक्रम भी लगवाए। पर मतदाताओं के दिलों को कोई झकझोर न सका। झकझोरता भी कैसे, प्रचार अभियान के दौरान एक भाजपा नेता ने कहा था, ‘हम मोदी जैसी कशिश कृष्णा पटेल में कैसे पैदा कर सकते हैं?’ सुना यह भी देखा गया कि सीट पर भाजपा से टिकट के दावेदार पटेल बिरादरी के नेता अपनों के बीच कहते रहे कि सीट अपना दल के ही पास रही तो अपना तो नंबर ही नहीं लगेगा?

वहीं सपा प्रत्याशी महेंद्र पटेल ने अपने भाई मंत्री सुरेंद्र पटेल की छवि के चलते सपा के परंपरागत वोट बैंक के अलावा हर जाति में सेंध लगाई। बसपा की गैरमौजूदगी के कारण अमूमन सपा को वोट न देने वाले दलित मतदाताओं ने यहां साइकल से परहेज नहीं बरता। वहीं क्षेत्र में पटेलवाद से मुक्ति का कीड़ा भी रेंग रहा था। प्रचार अभियान के दौरान विभिन्न खेमों में यह आवाज अंदर ही अंदर जोर पकड़ती रही। नतीजा यह रहा कि ज्यों, ज्यों पटेल अपना दल से ज्यादा सटता गया, गैर पटेल छिटकता रहा। पहले वह निर्दल मिंटू राय की तरफ मुड़ा, पर जब देखा मिंटू मुख्य लड़ाई में नहीं आ पा रहे हैं तो वह मजबूरी में साइकल की तरफ मुड़ गया। मोदी फैक्टर की खुमारी में ऊंघते लोग इस ‘इनरस्विंग’ को महसूस ही नहीं कर पाए।
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