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कन्याकुमारी में सोनिया और मोदी की प्रतिष्ठा दांव पर

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हिंद महासागर, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के संगम स्थल कन्याकुमारी में रोचक चुनावी मुकाबला हो रहा है। मुख्यत: पर्यटन पर निर्भर रहने वाले लोगों के सामने मुद्दे भी राष्ट्रीय बन गए हैं।
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तमिलभाषी प्रदेश में अंग्रेजी ही बातचीत का माध्यम है लेकिन यहां लोग हिंदी में जवाब देकर शायद यह जताना चाहते हैं कि वे भी देश की मुख्य धारा में शामिल हैं।

चाहे कृष्णन मिले या सेल्वन, सब ने कहा कि हिंदी हमारी रोजी रोटी की मजबूरी है। देश के अन्य भागों से आकर यहां कारोबार कर रहे लोगों ने भी इसे तमिल परिवेश से थोड़ा अलग बना दिया है। इससे यहां चुनाव का रंग भी अलग हो गया है।
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39 संसदीय सीटों वाले तमिलनाडु में चुनाव मुख्य तौर पर दोनों द्रविड़ पार्टियां यानी अन्नाद्रमुक और द्रमुक लड़ रही हैं, लेकिन यह अकेली सीट है जहां मुख्य मुकाबला दोनों राष्ट्रीय पार्टियों- कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच हो रहा है।

यही कारण है कि दोनों के शीर्ष नेता- सोनिया गांधी और नरेंद्र मोदी ने भी एक दूसरे पर शब्द-बाण चलाने के लिए कन्याकुमारी को चुना।

अकेले कन्याकुमारी आईं सोनिया गांधी

सोनिया तो पूरे तमिलनाडु में सिर्फ यहीं आईं और श्रीलंकाई तमिलों के लिए अपने पति राजीव गांधी की कुर्बानी की बात छेड़कर स्थानीय लोगों की भावनाओं को कुरेद गईं।

पहले कन्याकुमारी नागरकोल संसदीय क्षेत्र का हिस्सा था। 2008 के पुनर्गठन के बाद इसे अपने नाम से पहचान मिल गई। लोग गिनाना नहीं भूलते हैं कि अब तक 15 लोकसभा चुनावों में से 12 बार इस सीट को कांग्रेसियों ने कब्जाया है।

यहां से दो बार संगठन कांग्रेस और दो बार तमिल मनीला कांग्रेस के टिकट पर कांग्रेसी ही जीते। कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले भारतरत्न के. कामराज की यही सीट रही है। पिछले तीन चुनावों में गठबंधनों के कारण यह सीट कांग्रेस के कब्जे में नहीं आई।

इस बार पार्टी ने ‘मनी बैग’ के टैग से चर्चित बड़े कारोबारी 283 करोड़ की घोषित संपत्ति वाले वसंत कुमार को यहां से उतार कर पूरी ताकत झोंक दी है। यही कारण है कि सोनिया गांधी को स्वयं यहां आना पड़ा।

नरेंद्र मोदी ने भी रोचक किया मुकाबला

उधर सोनिया के अगले ही दिन नरेंद्र मोदी ने यहां आकर माहौल ही बदल दिया। इस करिश्मे के कारण प्रदेश की इस एक सीट पर भाजपा अपने को मजबूत स्थिति में पा रही है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष पी राधाकृष्णन यहां मैदान में हैं। वे यहां से चुनाव जीतकर अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री रह चुके हैं। धनबल से भी कमजोर नहीं हैं।

इन दोनों के मुकाबले को रोचक बनाने के लिए अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र के विरोध में जन आंदोलन चलाने वाले एस पी उदय कुमार को यहां उतरा है।

मछुआरों में अपनी अच्छी पैठ के कारण ये काफी वोट काटने में सफल हो सकते हैं। इस क्षेत्र से सांसद रह चुके सीपीएम के बेल्लारमिन भी मैदान में हैं।

मुकाबले के इतने राष्ट्रीय तत्वों के बीच दोनों द्रविड़ पार्टियों-अन्नाद्रमुक और द्रमुक के प्रत्याशी भी अपने कैडर वोट के भरोसे डटे हैं। लेकिन, गणित इतना ही नहीं है। यहां 50 फीसदी से ज्यादा ईसाई समुदाय के लोग हैं।

इन मतदाताओं पर चर्च के बिशप का अच्छा प्रभाव माना जाता है। जवाब में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का तंत्र भी सक्रिय दिख रहा है। पिछले चुनावों में जातीय आधार हार-जीत का बड़ा कारण बना।

इस बार इन वोटों में भी बंदरबांट हो रही है। उधर यहां पैसे का खेल ऐसा है जो अगले दो रोज में किसका पासा पलट दे इसका अनुमान लगाना मुश्किल है।
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हार-जीत का अलग-अलग नजरिया

यहां हार-जीत के कारण पर लोगों का अलग नजरिया है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक अपना प्रभाव बताना आम बात है। लोग कहते हैं शायद मोदी ने इसलिए ताकत झोंक दी कि इस सीट को जीत कर कह सकें कि कन्याकुमारी तक चला उनका जादू। सोनिया भी इसी कारण से उनके विजय रथ को यहां रोकना चाहती हैं।

सोनिया और मोदी की जनसभाएं दोनों को तौल रही हैं, लेकिन लोग यह भी बताने में नहीं हिचकते कि सब पैसे का खेल है। लोगों को 300 रुपये के साथ बिरयानी खाने को मिलती है।

सभा किसी की भी हो लोग बसों में भरकर भीड़ बढ़ाने आ जाते हैं। नेताओं को यह भ्रम होता है कि ये सब उनके समर्थक हैं। एक सवाल उछला, आप ही बताइए झुलसाने वाली गर्मी में किसे पड़ी है कि मुफ्त में भाषण सुनने जाए।

नौजवान बताते हैं कि सभी लोग मछली मारने नहीं जा सकते। यहां पर्यटन को छोड़कर रोजगार का कोई साधन नहीं है। यही सीजन होता है लेकिन चुनाव में फंसे होने के कारण लोग कम आ रहे हैं।

इन्हें उम्मीद है कि चुनाव खत्म होते ही पर्यटकों का संख्या बढ़ेगी। उस पर एक ने जोड़ा- मोदी पीएम बन जाएंगे तो वैसे ही पर्यटन बढ़ेगा। नरेंद्र मोदी यहां भाषण में यही कह गए हैं।
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