सर्वोच्च अदालत ने सोशल वेबसाइट्स पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों के चलते लोगों की गिरफ्तारी को गंभीर और शर्मनाक करार दिया है।
ऐसे मामलों में गिरफ्तारी पर आपत्ति जताते हुए अदालत ने कहा है कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (आईटी एक्ट) की धारा 66-ए के तहत पुलिस को मिले गिरफ्तारी के अधिकार में उचित दिशा-निर्देश का अभाव है क्योंकि यह स्पष्ट नहीं है कि पुलिस को कब अपने इस अधिकार का उपयोग करना चाहिए।
साथ ही अदालत ने केंद्र के ऐसी गिरफ्तारी की घटनाओं को इक्का दुक्का बताने के तर्क से भी अपनी असहमति जताई।
न्यायमूर्ति जे चेलमेश्वर की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि प्रावधानों के उलट आईटी एक्ट की धारा 66ए में यह स्पष्ट नहीं है कि किन परिस्थितियों में इसका इस्तेमाल होना चाहिए।
ऐसा प्रतीत होता है कि अगर किसी ने अपमानजनक बात न भी कही हो लेकिन अगर उसके इस बयान से कोई नाराज है तो इस धारा का इस्तेमाल हो सकता है। पूर्व में ऐसी घटनाएं देखने को मिली हैं जब लोगों को गलत गिरफ्तार किया गया।
मालूम हो कि इस धारा के तहत सोशल वेबसाइट्स पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने वालों के लिए सजा का प्रावधान है। इसके तीन साल तक की कैद हो सकती है।